वैश्विक संघर्षों के दौर में ट्रंप की शांति पहल पर सवाल, दुनिया की नजर ‘बोर्ड ऑफ पीस’ पर

Authored By: News Corridors Desk | 23 Jan 2026, 08:09 PM
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वैश्विक संघर्षों के बीच ट्रंप का नया कूटनीतिक दांव

दुनियाभर में चल रहे युद्ध और संघर्षों के बीच अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक नया कूटनीतिक दांव खेला है। स्विट्जरलैंड के दावोस में उन्होंने ‘बोर्ड ऑफ पीस’ नाम से एक नए अंतरराष्ट्रीय मंच की नींव रखी। ट्रंप का दावा है कि यह मंच गाजा में स्थायी शांति लाने के साथ-साथ दुनिया के अन्य संघर्ष क्षेत्रों में भी समाधान की दिशा में अहम भूमिका निभाएगा। हालांकि, इस पहल को लेकर वैश्विक मंच पर मिली-जुली प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं।

क्या है ‘बोर्ड ऑफ पीस’? ट्रंप प्रशासन का दावा

सबसे पहले समझिए कि यह ‘बोर्ड ऑफ पीस’ आखिर है क्या। ट्रंप प्रशासन के मुताबिक, यह एक नया अंतरराष्ट्रीय संगठन है, जिसका उद्देश्य युद्ध और संघर्ष से प्रभावित क्षेत्रों में शांति स्थापित करना, कानून के तहत स्थिर शासन व्यवस्था को बढ़ावा देना और लंबे समय तक टिकने वाली शांति सुनिश्चित करना है। इसकी शुरुआत गाजा में इस्राइल-हमास युद्ध के बाद हुए युद्धविराम के दूसरे चरण के दौरान की गई। ट्रंप का कहना है कि यह मंच केवल मध्य-पूर्व तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि दुनिया के अन्य संघर्षों को खत्म करने में भी भूमिका निभाएगा।

‘बोर्ड ऑफ पीस’ और भारत की भूमिका पर बढ़ी चर्चा

इस मंच के गठन के साथ ही भारत की भूमिका को लेकर चर्चाएं तेज हो गईं। ट्रंप ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस बोर्ड में शामिल होने का निमंत्रण दिया था, लेकिन भारत दावोस में इस कार्यक्रम का हिस्सा नहीं बना। सरकारी सूत्रों के मुताबिक, भारत सरकार ने अब तक इस पर कोई अंतिम फैसला नहीं लिया है और इस पहल को बेहद संवेदनशील मानते हुए सभी पहलुओं पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है।

भारत की सतर्कता और संतुलित विदेश नीति

भारत की सतर्कता के पीछे उसकी लंबे समय से चली आ रही संतुलित विदेश नीति मानी जा रही है। भारत लगातार इस्राइल-फलस्तीन विवाद में दो-राष्ट्र समाधान का समर्थन करता रहा है। भारत की नीति यह रही है कि इस्राइल और फलस्तीन दोनों अपने-अपने मान्यता प्राप्त सीमाओं के भीतर शांति और सुरक्षा के साथ रहें। ऐसे में ट्रंप के ‘बोर्ड ऑफ पीस’ का ढांचा और उसकी भूमिका भारत के लिए कूटनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील मानी जा रही है।

क्या ‘बोर्ड ऑफ पीस’ संयुक्त राष्ट्र की भूमिका को करेगा कमजोर?

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ा सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या ट्रंप का ‘बोर्ड ऑफ पीस’ संयुक्त राष्ट्र (UN) की भूमिका को कमजोर करेगा। कई देशों और कूटनीतिक विशेषज्ञों को आशंका है कि यह नया मंच कहीं यूएन के प्रभाव को चुनौती देने वाला समानांतर ढांचा न बन जाए। हालांकि ट्रंप ने कहा है कि यह बोर्ड यूएन के साथ मिलकर काम कर सकता है, लेकिन दोनों के बीच तालमेल कैसे होगा, इस पर अब तक स्थिति साफ नहीं है।

समर्थन बनाम दूरी: दो खेमों में बंटी दुनिया

दिलचस्प बात यह है कि इस पहल को लेकर दुनिया दो खेमों में बंटी नजर आ रही है। समर्थन करने वाले देशों में अर्जेंटीना, मिस्र, सऊदी अरब, यूएई, पाकिस्तान, वियतनाम और बहरीन जैसे नाम शामिल हैं। वहीं दूरी बनाए रखने वालों की सूची भी कम ताकतवर नहीं—भारत, फ्रांस, ब्रिटेन, चीन, रूस, जर्मनी और तुर्किये जैसे देश अभी सोच-विचार की स्थिति में हैं।

शांति का मंच या नई वैश्विक राजनीति की शुरुआत?

ट्रंप का ‘बोर्ड ऑफ पीस’ जहां एक तरफ शांति का नया वैश्विक मॉडल बनने का दावा कर रहा है, वहीं दूसरी ओर यह अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नए ध्रुवीकरण की वजह भी बन सकता है। भारत जैसे देश जल्दबाज़ी में कोई फैसला लेने के बजाय हर पहलू को तौलना चाहते हैं।

निष्कर्ष: सोच-समझकर उठाया गया भारत का कूटनीतिक कदम

कुल मिलाकर, जहां ट्रंप ‘बोर्ड ऑफ पीस’ को शांति का नया वैश्विक मॉडल बता रहे हैं, वहीं कई देश इसे संयुक्त राष्ट्र की भूमिका को चुनौती देने वाले मंच के तौर पर भी देख रहे हैं। भारत की दूरी किसी जल्दबाज़ी का नहीं, बल्कि सोच-समझकर उठाए जा रहे कूटनीतिक कदमों का संकेत है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह मंच वाकई शांति का रास्ता खोलेगा या वैश्विक राजनीति में नई खींचतान की वजह बनेगा।