मोहन भागवत का संदेश : 'भारतवर्ष रहेगा तो दुनिया रहेगी, विश्व को सुख का मार्ग देने का समय आ गया है'

Authored By: News Corridors Desk | 10 Feb 2026, 06:49 PM
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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत 1 दिन के नासिक प्रवास पर पहुंचे। वह नासिक के चांदवड तालुका के णमोकार तीर्थ स्थल पर आयोजित अंतरराष्ट्रीय पंचकल्याणक एवं महामास्ताकाभिषेक उत्सव में शामिल हुए। इस दौरान उन्होंने मंच से संबोधन दिया और भारत, धर्म और समाज के बारे में कई महत्वपूर्ण बातें साझा कीं।

भागवत ने कहा कि “भारतवर्ष रहेगा तो दुनिया रहेगी”। उनका मानना है कि भारत का अस्तित्व सिर्फ देश के लिए नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है कि दुनिया को सुख का मार्ग दिखाया जाए। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि हर व्यक्ति की सोच और रास्ता अलग हो सकता है। “हर एक का अपना-अपना तरीका है, अपना-अपना विचार, अपना-अपना दर्शन है। मेरा मेरे लिए सही है, उनका उनके लिए सही है। लेकिन इसको लेकर झगड़ा मत करो।” उनका संदेश स्पष्ट था कि भिन्नता को स्वीकार करते हुए शांतिपूर्ण और अनुशासित जीवन जीना जरूरी है।

धर्म का पालन और समाज की समस्याएँ
भागवत ने कहा कि आज मानव जीवन में जितनी भी समस्याएँ हैं, उनमें सबसे बड़ी वजह यह है कि लोग धर्म का पालन नहीं कर रहे। उन्होंने इसे समाज की मूलभूत समस्या बताया। उनका कहना था कि भारत का सौभाग्य है कि हमारे पूर्वजों ने सदियों से धर्म का पालन और अनुशासन बनाए रखा। इसी परंपरा की वजह से भारत ने विभिन्न धर्मों और पंथों के बीच सहिष्णुता और समरसता का रास्ता अपनाया। उन्होंने जोर देकर कहा कि धर्म का अवलंबन केवल व्यक्तिगत जीवन के लिए ही नहीं, बल्कि समाज और पूरी दुनिया के लिए जरूरी है।

साथ रहने का अनुशासन
डॉ. भागवत ने कहा कि भारत में विविधता बहुत ज्यादा है। अलग-अलग पंथ, संप्रदाय और विचारधारा के लोग यहां रहते हैं। लेकिन इस विविधता को स्वीकार करने की भारत की मनोवृत्ति हमेशा रही है। उन्होंने कहा कि यह जरूरी है कि हम सब मिल-जुलकर रहें और साथ रहने का अनुशासन अपनाएं। इसका मतलब है कि अपने और दूसरों के विचारों का सम्मान करना और विवाद से बचना। उन्होंने इसे “अपरिग्रह का अनुशासन” बताया, यानी स्वार्थ से ऊपर उठकर सहयोग और समरसता बनाए रखना।

विश्व को सुख का मार्ग देने की जिम्मेदारी
भागवत ने कहा कि आज दुनिया ने केवल भौतिक विकास पर ध्यान दिया है। पिछले 2000 सालों में भौतिक सुख-सुविधाएँ बढ़ीं, लेकिन असली सुख और संतुलन नहीं आया। उनका मानना है कि धर्म और नैतिक अनुशासन ही वह मार्ग हैं, जिनके माध्यम से मनुष्य जीवन और सृष्टि का संतुलन बनाए रखा जा सकता है। भारत की प्राचीन परंपरा और महापुरुषों की शिक्षाएँ आज भी इस दिशा में मार्गदर्शन करती हैं।

भागवत ने कहा कि भारत केवल अपने लिए नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए सुख और संतुलन का स्रोत बन सकता है। उन्होंने सभी से अपील की कि वे भौतिकता में फँसने की बजाय अपने जीवन में धर्म, अनुशासन और सहिष्णुता को बनाए रखें। उनका संदेश था कि धर्म का पालन, समाज में अनुशासन और आपसी सम्मान ही दुनिया को स्थायी सुख और संतुलन की ओर ले जा सकता है।

निष्कर्ष
डॉ. मोहन भागवत का यह संदेश साफ है: भारत का अस्तित्व केवल देश के लिए नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए महत्वपूर्ण है। हर व्यक्ति के अपने विचार और रास्ते हो सकते हैं, लेकिन किसी पर दूसरों के रास्ते को थोपने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। धर्म का पालन, सहिष्णुता और अनुशासन ही समाज और विश्व को सही दिशा में ले जाने का मार्ग है। भारत की प्राचीन परंपरा आज भी लोगों को यह सिखाती है कि विविधता में भी साथ रहना, आपसी सम्मान बनाए रखना और नैतिक अनुशासन का पालन करना ही स्थायी सुख और विकास का रास्ता है।