सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी के नए नियमों पर रोक लगाई
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए नियमों को लेकर पूरे देशभर में विरोध की खबरें सामने आईं। नए नियमों को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने आज सुनवाई की। मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने मामले पर विचार करते हुए यूजीसी के 2026 के नियमों पर फिलहाल रोक लगा दी है। इस मामले में अगली सुनवाई 19 मार्च को तय की गई है। यूजीसी ने 23 जनवरी, 2026 को उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता बढ़ाने के उद्देश्य से नई गाइडलाइंस अधिसूचित की थीं। हालांकि, ये नियम कुछ छात्र समूहों और याचिकाकर्ताओं द्वारा विवादित माने जा रहे हैं।
नए नियमों के खिलाफ उठी आपत्तियां
याचिकाकर्ताओं ने नए नियमों को मनमाना और भेदभावपूर्ण बताया। उनका तर्क है कि नियमों में भेदभाव की परिभाषा केवल SC, ST और OBC तक सीमित दिखाई देती है, जबकि सामान्य वर्ग (General Caste) के छात्रों के लिए कोई संस्थागत सुरक्षा या शिकायत निवारण प्रणाली मौजूद नहीं है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि नियम समानता बढ़ाने का दावा करते हुए वास्तव में भेदभाव को बढ़ाते हैं और सामान्य वर्ग के छात्रों को ‘नेचुरल ऑफेंडर’ मानते हैं। इसलिए उनका कहना है कि सुप्रीम कोर्ट निर्णय लेने तक इन नियमों का लागू होना रोक दिया जाए।
सुनवाई में मुख्य बिंदु और बहस
सुनवाई के दौरान वकील विष्णु शंकर जैन ने कहा कि जाति आधारित भेदभाव की परिभाषा अधूरी है और कानून यह नहीं मान सकता कि भेदभाव केवल किसी विशेष वर्ग के खिलाफ हो। CJI सूर्यकांत ने पूछा कि अगर दक्षिण भारत का छात्र उत्तर भारत में पढ़ाई करे या उत्तर का छात्र दक्षिण में एडमिशन ले, तो ऐसे मामलों को कौन सा प्रावधान कवर करता है। वकील ने बताया कि यह धारा 3ई में शामिल है। उन्होंने यह भी कहा कि नई परिभाषा में ‘रैगिंग’ का जिक्र नहीं है और विश्वविद्यालयों को जातियों में बांटना सही नहीं है। CJI ने टिप्पणी की कि समाज को 75 वर्षों के बाद वर्गहीन बनाना चाहिए, लेकिन नई व्यवस्था से कहीं प्रतिगामी प्रवृत्ति नजर आ रही है। उन्होंने हॉस्टल में अलगाव और अंतरजातीय विवाह के उदाहरण देते हुए चेताया कि सामाजिक समरसता बनी रहनी चाहिए।
न्यायालय का दृष्टिकोण और आगे की कार्रवाई
CJI ने स्पष्ट किया कि आज कोई अंतिम आदेश पारित नहीं किया जाएगा, लेकिन कोर्ट को इस मुद्दे पर ध्यान रखना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि समाज का समग्र विकास होना चाहिए और इसके लिए SG तुषार मेहता से सुझाव लिया गया कि कुछ प्रतिष्ठित व्यक्तियों की समिति बनाई जाए, जो भेदभाव के बिना शिक्षा संस्थानों में समानता सुनिश्चित कर सके। वकील इंदिरा जयसिंह ने अदालत को बताया कि यह याचिका 2019 से लंबित है और पुराने 2012 के नियमों को चुनौती देने वाली थी, जिन्हें अब 2026 के नियमों ने प्रतिस्थापित किया है। CJI ने कहा कि अब 2012 के नियमों पर लौटकर विचार नहीं किया जा सकता और कैंपस में किसी भी तरह का अलगाव नहीं होना चाहिए।