सोनिया गांधी के घर रणनीतिक बैठक
संसद के बजट सत्र से पहले कांग्रेस ने सरकार को घेरने की रणनीति तेज कर दी है। इसी क्रम में कांग्रेस संसदीय रणनीति समूह की एक अहम बैठक पार्टी की वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी के आवास 10 जनपथ पर बुलाई गई। बैठक का मकसद सदन के भीतर और बाहर सरकार को महंगाई, बेरोजगारी और सीमा सुरक्षा जैसे मुद्दों पर घेरने की रूपरेखा तय करना था। लेकिन इस हाई-प्रोफाइल मीटिंग में कांग्रेस सांसद शशि थरूर की गैरमौजूदगी ने सियासी गलियारों में हलचल मचा दी।
थरूर की गैरहाजिरी पर उठे सवाल
सूत्रों के मुताबिक, शशि थरूर को इस बैठक के लिए विशेष रूप से आमंत्रित किया गया था, इसके बावजूद वे इसमें शामिल नहीं हुए। थरूर के कार्यालय की ओर से सफाई दी गई कि वे देश से बाहर हैं और किसी कारणवश लौट नहीं सके, जिसकी सूचना पार्टी को पहले ही दे दी गई थी। हालांकि, राजनीतिक जानकार इसे केवल व्यस्तता नहीं मान रहे हैं। कांग्रेस के भीतर इसे पार्टी नेतृत्व से बढ़ती दूरी और संभावित असंतोष के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
बैठक में कौन-कौन नेता रहे मौजूद
10 जनपथ पर हुई इस बैठक में कांग्रेस के लगभग सभी शीर्ष नेता शामिल हुए। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी, राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल, जयराम रमेश, पी. चिदंबरम, प्रमोद तिवारी, मनीष तिवारी, रजनी पाटिल, माणिक्कम टैगोर और तारिक अनवर जैसे वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी ने बैठक के महत्व को और बढ़ा दिया। बैठक में बजट सत्र के दौरान सरकार को घेरने की रणनीति पर विस्तार से चर्चा की गई।
रणनीतिक बैठकों में थरूर की भूमिका और अब सवाल
शशि थरूर को कांग्रेस के सबसे प्रभावी और तार्किक वक्ताओं में गिना जाता है। संसद में सरकार को जवाब देना हो या किसी जटिल मुद्दे पर बहस की शुरुआत करनी हो, थरूर पार्टी की अग्रिम पंक्ति में रहते आए हैं। ऐसे में, जब सोनिया गांधी स्वयं बैठक की अध्यक्षता कर रही हों और थरूर उसमें शामिल न हों, तो इसे असामान्य माना जा रहा है। कांग्रेस के अंदरखाने में इसे केवल संयोग नहीं, बल्कि एक राजनीतिक संदेश के रूप में देखा जा रहा है।
पुरानी नाराजगी या नई सियासी दिशा?
यह पहली बार नहीं है जब शशि थरूर पार्टी की बैठकों से दूरी बनाते दिखे हैं। पिछले कुछ महीनों में वे केरल कांग्रेस की बैठकों और दिल्ली में आयोजित AICC कार्यक्रमों में भी कम नजर आए हैं। अब तक यह माना जा रहा था कि उनकी नाराजगी स्थानीय नेतृत्व तक सीमित है, लेकिन सोनिया गांधी के बुलावे को नजरअंदाज करना कांग्रेस की परंपरा में एक बड़ी बात मानी जाती है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह घटना इस ओर इशारा कर रही है कि थरूर की असहजता अब केवल नाराजगी तक सीमित नहीं रह गई है और कांग्रेस के भीतर एक नई सियासी चर्चा को जन्म दे रही है।