शिंदे की होटल पॉलिटिक्स: डर से ज्यादा रणनीति की बू
एकनाथ शिंदे द्वारा बीएमसी चुनाव में जीते अपने सभी पार्षदों को फाइव स्टार होटल में शिफ्ट करना महज सुरक्षा या सतर्कता का मामला नहीं माना जा रहा है। राजनीतिक हलकों में इस कदम को एक सोची-समझी रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है। पहली नजर में ऐसा लगता है कि शिंदे को उद्धव ठाकरे गुट से पार्षदों के टूटने का डर है, लेकिन जब पूरे घटनाक्रम को गहराई से देखा जाता है तो साफ होता है कि यह कदम भाजपा के खिलाफ दबाव बनाने की राजनीति का हिस्सा भी हो सकता है।
बीएमसी रिजल्ट के बाद मेयर पद बना सबसे बड़ा सियासी सवाल
बीएमसी चुनाव के नतीजे आते ही मुंबई की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। सबसे बड़ा सवाल यह खड़ा हो गया है कि आखिर मुंबई का अगला मेयर किसका होगा। सवाल सिर्फ नाम का नहीं, बल्कि सत्ता और प्रभाव का है। क्या भाजपा मेयर बनाएगी या फिर एकनाथ शिंदे की शिवसेना इस पद पर अपना दावा मजबूत करेगी? यही वजह है कि मेयर पद को लेकर महायुति के भीतर भी खींचतान साफ नजर आने लगी है।
नतीजों के तुरंत बाद शुरू हुई होटल पॉलिटिक्स
बीएमसी चुनाव के नतीजे 16 जनवरी को सामने आए और ठीक अगले दिन, यानी 17 जनवरी को, एकनाथ शिंदे ने अपने सभी पार्षदों को बांद्रा स्थित ताज लैंड्स एंड होटल में ठहराने का फैसला किया। पार्टी की ओर से इसे चुनावी थकान और आराम से जोड़कर बताया गया, लेकिन राजनीतिक जानकार इसे पारंपरिक “होटल पॉलिटिक्स” मान रहे हैं, जहां असली मकसद पार्षदों को एकजुट रखना और किसी भी तरह की टूट से बचाना होता है।
भाजपा सबसे बड़ी पार्टी, लेकिन बहुमत से काफी दूर
बीएमसी चुनाव में भाजपा 227 में से 89 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी जरूर बनी है, लेकिन वह बहुमत के जादुई आंकड़े 114 से काफी पीछे है। यही कारण है कि भाजपा अपने दम पर न तो स्थायी सत्ता बना सकती है और न ही मेयर पद पर सीधा दावा ठोक सकती है। ऐसे में उसे अपने सहयोगी दलों, खासकर एकनाथ शिंदे गुट पर निर्भर रहना पड़ रहा है।
शिंदे गुट के हाथ में सत्ता की चाबी
एकनाथ शिंदे की शिवसेना ने 29 सीटें जीतकर खुद को बेहद मजबूत स्थिति में ला खड़ा किया है। भाजपा और शिंदे गुट को मिलाकर महायुति के पास कुल 118 सीटें हो जाती हैं, जो बहुमत से थोड़ा ऊपर है। यही आंकड़ा शिंदे को सौदेबाजी की ताकत देता है और उन्हें किंगमेकर की भूमिका में खड़ा करता है।
भाजपा की मजबूरी को भुनाने की कोशिश
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि शिंदे भाजपा की इसी मजबूरी को भुनाना चाहते हैं। वह जानते हैं कि अगर उनका समर्थन नहीं मिला, तो भाजपा के लिए मेयर बनाना बेहद मुश्किल हो जाएगा। यही वजह है कि शिंदे गुट ने भाजपा के सामने ढाई-ढाई साल के मेयर फॉर्मूले का प्रस्ताव रखा है, ताकि सत्ता में उनकी भी बराबर की हिस्सेदारी तय हो सके।
उद्धव ठाकरे से डर या भाजपा से दबाव की राजनीति?
हालांकि उद्धव ठाकरे गुट ने भी नतीजों के बाद मेयर पद को लेकर अपनी महत्वाकांक्षा जाहिर की है, लेकिन राजनीतिक संकेत यही बताते हैं कि शिंदे का असली निशाना भाजपा है। शिंदे जानते हैं कि उद्धव गुट विपक्ष में है और फिलहाल सत्ता तक पहुंचने की स्थिति में नहीं है, जबकि भाजपा उनकी जरूरत है।
विधानसभा चुनाव की यादें और बदले की राजनीति
महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव का अनुभव भी शिंदे की मौजूदा रणनीति की बड़ी वजह माना जा रहा है। उस चुनाव में महायुति ने शिंदे के चेहरे पर लड़ाई लड़ी थी, लेकिन जीत के बाद मुख्यमंत्री पद भाजपा ने अपने पास रख लिया। शिंदे को डिप्टी सीएम बनकर संतोष करना पड़ा। माना जा रहा है कि उसी राजनीतिक अनुभव की टीस अब बीएमसी की रणनीति में नजर आ रही है।
बीएमसी: देश की सबसे अमीर नगर निगम
बीएमसी सिर्फ एक नगर निगम नहीं, बल्कि देश की सबसे अमीर स्थानीय निकाय है। इसका बजट कई छोटे राज्यों के बजट से भी बड़ा है। ऐसे में मेयर पद पर कब्जा सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि प्रशासनिक और आर्थिक ताकत का प्रतीक भी है। यही वजह है कि शिंदे इस पद को इतनी आसानी से भाजपा को देने के मूड में नहीं हैं।
शिवसेना की विरासत का दावा मजबूत करना चाहते हैं शिंदे
अविभाजित शिवसेना ने दशकों तक बीएमसी पर राज किया है। एकनाथ शिंदे चाहते हैं कि कम से कम ढाई साल के लिए ही सही, लेकिन मेयर शिवसेना का हो। इससे वह अपने कार्यकर्ताओं और शिवसैनिकों को यह संदेश देना चाहते हैं कि बालासाहेब ठाकरे की असली राजनीतिक विरासत आज भी उनके पास है।
बालासाहेब ठाकरे की 100वीं जयंती बना सकती है मुद्दा
2026 में बालासाहेब ठाकरे की 100वीं जयंती है। माना जा रहा है कि शिंदे इस भावनात्मक पहलू को भी भाजपा के सामने रख सकते हैं। उनका तर्क हो सकता है कि इस ऐतिहासिक मौके पर मुंबई का मेयर शिवसेना का होना शिवसैनिकों की भावना से जुड़ा विषय है।
फडणवीस का बयान और अनिश्चितता बरकरार
देवेंद्र फडणवीस ने साफ कहा है कि मुंबई का मेयर कौन होगा, कितने समय के लिए होगा और किस फॉर्मूले से होगा—इस पर फैसला एकनाथ शिंदे से बातचीत के बाद ही लिया जाएगा। हालांकि अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि शिंदे गुट मेयर पद पर ढाई साल का दावा छोड़ने को तैयार नहीं है।
निष्कर्ष: दबाव की राजनीति अपने चरम पर
फिलहाल इतना साफ है कि फाइव स्टार होटल पॉलिटिक्स सिर्फ पार्षदों की सुरक्षा नहीं, बल्कि एक सख्त राजनीतिक संदेश है। एकनाथ शिंदे यह दिखाना चाहते हैं कि बीएमसी में उनके बिना सत्ता का समीकरण अधूरा है। अब देखना यह होगा कि भाजपा इस दबाव के आगे झुकती है या कोई नया सियासी फॉर्मूला सामने आता है।