महाराष्ट्र की राजनीति में बुधवार को वो हुआ, जिसकी उम्मीद शायद ही किसी को हो. भाजपा और कांग्रेस के नेता लगातार एक-दूसरे की आलोचना करते रहते हैं. इन दोनों पार्टियों की विचारधाराएं अलग-अलग होने के कारण, चाहे राज्य स्तर पर हो या देश स्तर पर, वे कभी एक साथ नहीं आए हैं. हालांकि, जो देश में नहीं हो पाया, वह अंबरनाथ में हो गया. भाजपा ने अंबरनाथ नगर परिषद में शिंदे को सत्ता से बाहर करने के लिए कांग्रेस से हाथ मिला लिया... जैसे ही यह बात पार्टी आलाकमान तक पहुंची, कांग्रेस में हड़कंप मच गया। तुरंत एक्शन लेते हुए कांग्रेस ने भाजपा के साथ जाने वाले अपने 12 निर्वाचित पार्षदों को निलंबित कर दिया। यहीं से खेल पूरी तरह पलट गया।
कांग्रेस की इस कार्रवाई के बाद अंबरनाथ की सियासत में नया ट्विस्ट आया। निलंबन झेल रहे ये 12 पार्षद सीधे भाजपा में शामिल हो गए। इससे भाजपा की ताकत और बढ़ गई। पहले जिस गठबंधन का मकसद शिंदे गुट को सत्ता से दूर रखना था, अब उसी प्रक्रिया में अंबरनाथ कांग्रेसमुक्त होता नजर आने लगा। तस्वीर साफ होती दिख रही है कि शिंदे की शिवसेना सत्ता से बाहर तो रहेगी ही, साथ ही कांग्रेस की पकड़ भी पूरी तरह ढीली पड़ चुकी है।
अगर आंकड़ों पर नजर डालें तो 59 सदस्यीय अंबरनाथ नगर परिषद में शिंदे की शिवसेना के पास 27 पार्षद हैं। भाजपा के पास 14, कांग्रेस के पास 12 और NCP के पास 4 पार्षद थे। लेकिन कांग्रेस के 12 पार्षदों के भाजपा में जाने के बाद भाजपा का आंकड़ा 31 तक पहुंच गया, जो बहुमत के लिए काफी है। ऐसे में शिंदे गुट 27 पार्षदों के बावजूद पीछे छूट गया। भाजपा की तेजश्री करुणजले पाटिल पहले ही महापौर पद का प्रत्यक्ष चुनाव जीत चुकी हैं, जिससे भाजपा की स्थिति और मजबूत हो गई है।
इस पूरे घटनाक्रम पर शिंदे की शिवसेना ने कांग्रेस पर भाजपा के साथ जाने का आरोप लगाते हुए कड़ी नाराजगी जताई है। वहीं, अंबरनाथ कांग्रेस अध्यक्ष प्रदीप पाटिल का कहना है कि गठबंधन का प्रस्ताव पहले भाजपा की ओर से आया था और उनका साथ भाजपा से नहीं बल्कि ‘अंबरनाथ विकास अघाड़ी’ से था। हालांकि, उन्होंने यह फैसला पार्टी के राज्य नेतृत्व को विश्वास में लिए बिना लिया, जिसकी वजह से उनके खिलाफ कार्रवाई की गई और 12 पार्षदों को निलंबित कर दिया गया।
अब हालात यह हैं कि कांग्रेस के निलंबित पार्षद भाजपा के साथ खड़े हैं और भाजपा का सत्ता में रहना लगभग तय नजर आ रहा है। अंबरनाथ की राजनीति में यह पूरा घटनाक्रम एक बात साफ कर देता है... यहां सियासत में न स्थायी दोस्त होते हैं, न स्थायी दुश्मन। दांव-पेंच बदलते हैं और खेल अचानक पूरी तरह पलट जाता है।