बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती कभी राजनीति में आने का सपना नहीं देखती थीं। उनका लक्ष्य बिल्कुल साफ था—IAS बनकर देश और दलित समाज की सेवा करना। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था।
1977 की एक सर्द रात, जिसने इतिहास बदल दिया
साल 1977, रात करीब 10 बजे। दिल्ली की कड़ाके की ठंड में एक घर के दरवाज़े पर जोर-जोर से दस्तक हो रही थी। उस वक्त 21 साल की मायावती खाना खाकर अपनी किताबों के ढेर के साथ पढ़ाई में जुटी थीं। वह उस समय दिल्ली विश्वविद्यालय से LLB की पढ़ाई कर रही थीं और प्रशासनिक सेवा की तैयारी में लगी थीं।
दरवाज़ा खोला तो सामने दो लोग खड़े थे।
एक को मायावती पहचानती थीं.. वे BAMCEF के नेता थे, जिनसे दलित समाज के कार्यक्रमों में मुलाकात होती रहती थी। उनके साथ खड़े दूसरे व्यक्ति के सिर पर कम बाल थे और गले में मफलर लिपटा हुआ था। यही थे कांशीराम—जिनसे मायावती की यह पहली मुलाकात थी।
“पढ़-लिखकर क्या बनना चाहती हो?”
लेखक अजय बोस अपनी पुस्तक में लिखते हैं कि कांशीराम ने मायावती से बिना भूमिका बांधे सीधा सवाल किया— “तुम्हारी मेज़ पर इतनी किताबें हैं, आखिर पढ़-लिखकर क्या बनना चाहती हो?”
मायावती का जवाब साफ था- “कलेक्टर।”, यह सुनते ही कांशीराम ने कहा- “तुम बहुत बड़ी गलती कर रही हो।”
कांशीराम की वो एक बात, जिसने सब कुछ बदल दिया
कांशीराम ने मायावती से कहा- “दलितों के लिए तुम्हारी हिम्मत और समर्पण मुझे साफ नज़र आ रहा है। एक दिन मैं तुम्हें इतना बड़ा नेता बना सकता हूँ कि एक नहीं, बल्कि कलेक्टरों की लाइन तुम्हारे सामने फाइल लेकर खड़ी होगी।”
करीब एक घंटे की उस पहली मुलाकात ने मायावती की सोच और दिशा दोनों बदल दीं। यहीं से उनका झुकाव प्रशासनिक सेवा से हटकर सामाजिक और राजनीतिक संघर्ष की ओर होने लगा।
घर में टकराव, पिता का विरोध
मायावती के इस फैसले से घर का माहौल बदल गया। उनके पिता प्रभुदयाल चाहते थे कि वह राजनीति छोड़कर पूरी तरह IAS की तैयारी करें। हालात यहां तक पहुंच गए कि रोज़ घर में क्लेश होने लगा। हालांकि मायावती उस समय स्कूल टीचर की नौकरी कर आत्मनिर्भर थीं, लेकिन पिता का दबाव बढ़ता चला गया। एक दिन पिता-पुत्री का विवाद इतना बढ़ गया कि प्रभुदयाल ने साफ चेतावनी दे दी- “या तो कांशीराम और राजनीति छोड़ो, या फिर यह घर।”
घर छोड़ना… सबसे कठिन फैसला
पिता की धमकी भी मायावती को डिगा नहीं सकी। उन्होंने कुछ ज़रूरी सामान उठाया और करोल बाग स्थित BAMCEF के दफ़्तर में रहने चली गईं। यह फैसला आसान नहीं था- लेकिन यही वह मोड़ था, जहां से मायावती की ज़िंदगी हमेशा के लिए बदल गई।
IAS नहीं बनीं, लेकिन इतिहास रच दिया
मायावती ने प्रशासनिक सेवा का सपना छोड़ दिया, लेकिन आगे चलकर वह ऐसी जननेता बनीं, जिनके आज भी लाखों समर्थक हैं। एक साधारण दलित परिवार की बेटी से लेकर उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनने तक का यह सफर सिर्फ राजनीति नहीं- हिम्मत, संघर्ष और विचारधारा की जीत की कहानी है।