देश में मतदान को अनिवार्य बनाने की मांग को लेकर दाखिल जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई से साफ इनकार कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि इस तरह के फैसले नीतिगत दायरे में आते हैं और इस पर आदेश देना न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र में नहीं है। यह याचिका अजय गोयल द्वारा दायर की गई थी, जिसमें मांग की गई थी कि मतदान को अनिवार्य किया जाए और जो लोग जानबूझकर वोट नहीं करते, उनके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई हो।
सुप्रीम कोर्ट की बेंच, जिसमें चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली शामिल थे, उन्होनें कहा कि, मतदान न करने वालों पर सजा या सरकारी सुविधाओं पर रोक लगाने जैसे निर्देश देना संभव नहीं है। ऐसे फैसले सरकार और नीति निर्धारकों के अधिकार क्षेत्र में आते हैं। कोर्ट ने याचिकाकर्ता को सुझाव दिया कि वे अपनी बात संबंधित संस्थाओं के सामने रखें।
CJI सूर्यकांत का स्पष्ट संदेश
चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने लोकतंत्र की मूल भावना पर जोर देते हुए कहा कि, लोकतंत्र कानूनी दबाव से नहीं, बल्कि जन-जागरूकता से मजबूत होता है। उन्होंने साफ किया कि हर नागरिक से मतदान की अपेक्षा की जाती है, लेकिन इसे जबरन लागू नहीं किया जा सकता।
याचिका पर उठे सवाल
याचिकाकर्ता ने सुझाव दिया था कि जो लोग वोट नहीं करते, उनकी सरकारी सुविधाएं सीमित की जाएं। इस पर कोर्ट ने कड़ा सवाल उठाते हुए कहा कि, क्या घर पर रहना अपराध माना जाएगा? क्या वोट न देने पर गिरफ्तारी की जाएगी? CJI ने कहा कि इस तरह के प्रस्ताव व्यावहारिक और संवैधानिक दोनों दृष्टि से उचित नहीं हैं।
कोर्ट ने यह भी माना कि अनिवार्य मतदान लागू करना आसान नहीं है:
कई लोग कामकाजी कारणों से वोट नहीं डाल पाते, न्यायाधीशों जैसे महत्वपूर्ण पदों पर बैठे लोग भी ड्यूटी में व्यस्त रहते हैं, साथ ही गरीब मजदूरों के सामने रोज़गार बनाम मतदान का सवाल होता है।कोर्ट ने सवाल उठाया कि, अगर कोई मजदूर कहे कि उसे रोज़ी कमानी है, तो उसे क्या जवाब दिया जाएगा?सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया कि, मतदान को अनिवार्य बनाना अदालत का नहीं, बल्कि सरकार का निर्णय है। लोकतंत्र में भागीदारी जागरूकता से बढ़ती है, न कि दबाव से।