Lenskart की गाइडलाइन पर बवाल: हिजाब की अनुमति, तिलक-बिंदी पर रोक?

Authored By: News Corridors Desk | 16 Apr 2026, 06:50 PM
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पॉपुलर आईवियर कंपनी लेंसकार्ट इन दिनों एक बड़े विवाद में घिरी हुई है। सोशल मीडिया पर कंपनी की कथित स्टाफ यूनिफॉर्म और ग्रूमिंग पॉलिसी का एक दस्तावेज तेजी से वायरल हो रहा है, जिसके बाद उस पर धार्मिक भेदभाव के आरोप लगने लगे हैं। विवाद की जड़ इस गाइडलाइन में बताए गए अलग-अलग धार्मिक प्रतीकों के लिए अलग-अलग नियम हैं। यूजर्स ने खास तौर पर हिजाब, पगड़ी, तिलक और बिंदी जैसे प्रतीकों को लेकर सवाल उठाए, जिससे मामला और गर्मा गया।

धार्मिक पक्षपात के लगे आरोप

वायरल दस्तावेज के अनुसार, स्टोर कर्मचारियों को ड्यूटी के दौरान काले रंग का हिजाब और सिख कर्मचारियों को काली पगड़ी पहनने की अनुमति थी। लेकिन इसी के साथ तिलक, बिंदी और कलावा जैसे हिंदू धार्मिक चिन्हों पर कथित रोक का जिक्र सामने आया, जिसने सोशल मीडिया पर नाराजगी बढ़ा दी। इसके विरोध में ‘Boycott Lenskart’ जैसे अभियान भी ट्रेंड करने लगे और कंपनी की नीतियों पर सवाल खड़े किए गए। ऑनलाइन सामने आई इस गाइडलाइन में यह भी कहा गया था कि कर्मचारी धार्मिक टीका, तिलक या बिंदी नहीं लगा सकते। इसी बिंदु को लेकर यूजर्स ने कड़ी आपत्ति जताई और इसे असमान व्यवहार बताया। लोगों का कहना है कि अगर कुछ धार्मिक प्रतीकों को अनुमति दी जा रही है, तो अन्य पर पाबंदी क्यों? इस मुद्दे ने सांस्कृतिक और धार्मिक समानता को लेकर बड़ी बहस छेड़ दी है।

पीयूष बंसल की सफाई

मामला बढ़ने के बाद कंपनी के फाउंडर Peyush Bansal सामने आए और उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर सफाई दी। उन्होंने वायरल दस्तावेज को पुराना और भ्रामक बताते हुए कहा कि मौजूदा पॉलिसी में किसी भी धार्मिक प्रतीक... चाहे वह बिंदी हो, तिलक हो या अन्य पर कोई प्रतिबंध नहीं है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि कर्मचारी अपनी आस्था के अनुसार खुद को व्यक्त करने के लिए स्वतंत्र हैं। हालांकि, उनकी सफाई के बावजूद विवाद पूरी तरह शांत नहीं हुआ है। कुछ यूजर्स का दावा है कि वायरल दस्तावेज हाल ही का है, ऐसे में उसे पुराना बताने पर सवाल उठ रहे हैं। कई लोगों ने कंपनी से मौजूदा ड्रेस कोड पॉलिसी को सार्वजनिक करने की मांग भी की है। फिलहाल यह मुद्दा कॉर्पोरेट दुनिया में धार्मिक समावेशिता और ड्रेस कोड की सीमाओं पर एक बड़ी बहस के रूप में उभर चुका है।

आखिरकार यह विवाद सिर्फ एक कंपनी की पॉलिसी तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह सवाल खड़ा करता है कि कॉर्पोरेट दुनिया में धार्मिक पहचान और पेशेवर ड्रेस कोड के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। ऐसे समय में पारदर्शिता और स्पष्ट नियम ही किसी भी संस्था की विश्वसनीयता को बनाए रख सकते हैं। अब सबकी नजर इस बात पर है कि लेंसकार्ट इस पूरे मामले को कैसे संभालता है और क्या वह अपने कर्मचारियों और ग्राहकों का भरोसा पूरी तरह बहाल कर पाता है या नहीं।