भारतीय जनता पार्टी के सांसद तेजस्वी सूर्या ने लोकसभा में परिसीमन विधेयक 2026 को लेकर विपक्ष पर तीखा हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि दक्षिण भारत में इस मुद्दे को लेकर जानबूझकर भ्रम फैलाया जा रहा है। उनके अनुसार, इस विधेयक में सभी राज्यों के साथ समान व्यवहार सुनिश्चित किया गया है और यह कहना गलत है कि इससे दक्षिणी राज्यों को नुकसान होगा। सूर्या ने यह भी कहा कि विपक्ष परिसीमन के मुद्दे को बहाना बनाकर महिला आरक्षण विधेयक को रोकने की कोशिश कर रहा है।
बहस के दौरान उन्होंने तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी के उस प्रस्ताव पर भी सवाल उठाए, जिसमें परिसीमन को राज्यों के जीएसडीपी से जोड़ने की बात कही गई थी। सूर्या ने इस मॉडल को अव्यावहारिक और असंवैधानिक बताते हुए कहा कि इससे एक व्यक्ति-एक वोट के मूल सिद्धांत का उल्लंघन होगा। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि अगर वोट की कीमत आर्थिक स्थिति से तय होने लगे, तो फिर अमीर और गरीब के बीच लोकतांत्रिक बराबरी खत्म हो जाएगी। उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि ऐसी स्थिति में मुकेश अंबानी जैसे उद्योगपति के पास लाखों वोट के बराबर ताकत हो सकती है, जबकि आम नागरिक का वोट केवल एक ही रह जाएगा, जो पूरी तरह से लोकतंत्र के मूल ढांचे के खिलाफ है।
बीजेपी सांसद ने आगे बताया कि प्रस्तावित योजना के तहत लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाकर लगभग 815 से 850 के बीच की जा सकती है। इसके तहत राज्यों को उनकी आनुपातिक हिस्सेदारी के आधार पर सीटें मिलेंगी। उदाहरण के तौर पर, तमिलनाडु की सीटें 39 से बढ़कर 59, कर्नाटक की 28 से 42, आंध्र प्रदेश की 25 से 38, तेलंगाना की 17 से 26 और केरल की 20 से 30 तक हो सकती हैं। सूर्या ने दावा किया कि इस प्रक्रिया के बाद भी दक्षिणी राज्यों की संसद में हिस्सेदारी लगभग 23.9% बनी रहेगी, जो वर्तमान के बराबर है। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार राज्यों के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है।
उन्होंने यह भी समझाया कि यदि केवल जनसंख्या के आधार पर 2011 की जनगणना के अनुसार सीटों का पुनर्निर्धारण किया जाता, तो दक्षिणी राज्यों को अपेक्षाकृत कम सीटें मिलतीं। उदाहरण के तौर पर, तमिलनाडु को 49 सीटें मिलतीं, लेकिन नए प्रस्ताव में उसे 59 सीटें दी जा रही हैं। इसी तरह केरल को 23 के बजाय 30 सीटें और कर्नाटक को 41 के बजाय 42 सीटें मिलेंगी। सूर्या के मुताबिक, मौजूदा प्रस्ताव का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सभी राज्यों को न्यायसंगत प्रतिनिधित्व मिले और किसी क्षेत्र के साथ भेदभाव न हो।
अब समझिए, परिसीमन की यह प्रक्रिया सिर्फ सीटों के बंटवारे तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत के लोकतंत्र को और मजबूत बनाने की दिशा में एक अहम कदम भी हो सकती है। अगर इसे पारदर्शिता और संतुलन के साथ लागू किया गया, तो हर राज्य को उचित प्रतिनिधित्व मिलेगा और एक व्यक्ति-एक वोट का सिद्धांत और मजबूत होगा। अब नजर इस बात पर रहेगी कि सरकार और विपक्ष मिलकर ऐसा समाधान निकालें, जो पूरे देश के हित में हो और लोकतंत्र की नींव को और सशक्त बनाए।