पिछले डेढ़ दशक तक पश्चिम बंगाल भारतीय जनता पार्टी के लिए एक बेहद कठिन राजनीतिक क्षेत्र बना हुआ था। ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस का मजबूत दबदबा था, जिसे तोड़ना आसान नहीं माना जाता था। लेकिन लंबे समय तक लगातार प्रयास और रणनीतिक काम के बाद बीजेपी ने इस चुनौतीपूर्ण किले को भी ढहा दिया। इससे पहले दिल्ली में अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी को कड़ी टक्कर देकर बीजेपी ने अपनी स्थिति मजबूत की थी।
अब सवाल यह उठता है कि बीजेपी के सामने अगली बड़ी चुनौतियां क्या हैं। मौजूदा स्थिति में तीन राज्य ऐसे माने जा रहे हैं, जहां पार्टी अभी भी पूरी तरह मजबूत नहीं हो पाई है पंजाब, केरल और तमिलनाडु। इन राज्यों को बीजेपी के लिए “अविजित किले” के रूप में देखा जाता है। हालांकि पार्टी धीरे-धीरे इन क्षेत्रों में अपनी पकड़ बनाने की कोशिश कर रही है।
पंजाब: जटिल समीकरणों वाला मैदान
पंजाब में बीजेपी का राजनीतिक सफर हमेशा चुनौतीपूर्ण रहा है। 2022 के विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी की बड़ी जीत के बाद राज्य की राजनीति में बड़ा बदलाव आया और शिरोमणि अकाली दल के साथ बीजेपी का पुराना गठबंधन भी टूट गया। 2027 के चुनावों से पहले राजनीतिक हलचल बढ़ी है, खासकर आम आदमी पार्टी के भीतर मतभेदों के चलते।
2020-21 के किसान आंदोलन ने बीजेपी की छवि को खासा प्रभावित किया, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में पार्टी को नुकसान हुआ। यहां की राजनीति में कृषि मुद्दे, क्षेत्रीय पहचान और सिख समुदाय की प्राथमिकताएं अहम भूमिका निभाती हैं। बीजेपी अब शहरी और पारंपरिक हिंदू वोट बैंक को मजबूत करने पर ध्यान दे रही है, साथ ही केंद्र सरकार की योजनाओं के जरिए समर्थन बढ़ाने की कोशिश कर रही है। हालांकि पार्टी को यहां निर्णायक जीत के लिए किसी मजबूत क्षेत्रीय सहयोगी की जरूरत पड़ सकती है, क्योंकि अकेले सत्ता तक पहुंचना फिलहाल आसान नहीं दिखता।
केरल: सबसे कठिन मोर्चा
केरल को अक्सर बीजेपी के लिए “फाइनल फ्रंटियर” कहा जाता है। यहां दशकों से दो प्रमुख गठबंधन—वाम मोर्चा (LDF) और कांग्रेस-नेतृत्व वाला UDF—के बीच सीधी टक्कर रही है। बीजेपी अभी यहां सीटें जीतने से ज्यादा अपने वोट प्रतिशत को बढ़ाने पर ध्यान दे रही है। राज्य की राजनीति वामपंथी विचारधारा, ट्रेड यूनियनों और अल्पसंख्यक समुदायों के प्रभाव में रही है। बीजेपी के लिए यहां अपनी स्वीकार्यता बढ़ाना आसान नहीं रहा, क्योंकि उसके खिलाफ एक मजबूत धारणा बनी हुई है। हालांकि जमीनी स्तर पर संगठनात्मक काम लगातार जारी है। हाल के चुनावों में कुछ क्षेत्रों में पार्टी ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है, जिससे संकेत मिलता है कि लंबी अवधि में वह यहां अपनी स्थिति मजबूत कर सकती है, लेकिन फिलहाल यह एक कठिन लक्ष्य बना हुआ है।
तमिलनाडु: पहचान और संस्कृति की राजनीति
तमिलनाडु बीजेपी के लिए सबसे चुनौतीपूर्ण राज्यों में से एक माना जाता है। यहां की राजनीति लंबे समय से द्रविड़ विचारधारा, भाषाई पहचान और क्षेत्रीय दलों के इर्द-गिर्द घूमती रही है। डीएमके और एआईएडीएमके के बीच प्रतिस्पर्धा लंबे समय तक मुख्य रही।
हालांकि हालिया राजनीतिक घटनाक्रम में अभिनेता विजय की पार्टी टीवीके के उभरने से राज्य की राजनीति में नया मोड़ आया है। इससे मुकाबला अब बहुकोणीय हो गया है।
राज्य में जातीय और सांस्कृतिक पहचान, साथ ही भाषा से जुड़े मुद्दे काफी प्रभावशाली हैं। बीजेपी यहां गठबंधन राजनीति के जरिए अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश कर रही है और कुछ क्षेत्रों में उसका प्रभाव बढ़ा भी है। लेकिन अभी उसे व्यापक स्तर पर स्वीकार्यता हासिल करने के लिए लंबा रास्ता तय करना होगा।