Assam Elections 2026: असम विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों ने एक बात बिल्कुल स्पष्ट कर दी है कि नॉर्थ-ईस्ट की राजनीति में हिमंत बिस्वा सरमा का प्रभाव सबसे मजबूत बना हुआ है। भारतीय जनता पार्टी जिस तरह राज्य में लगातार तीसरी बार जीत की ओर बढ़ती दिख रही है, उसने दिल्ली से लेकर गुवाहाटी तक के राजनीतिक विश्लेषकों को चौंका दिया है। इस पूरी चुनावी कहानी में दो शब्द बार-बार सुनाई दिए ‘मामा’ और ‘मियां’, जिन्होंने चुनावी माहौल को खास दिशा दी।
‘मामा’ इमेज और महिलाओं का जुड़ाव
राज्य में छोटे बच्चों से लेकर बुजुर्ग महिलाओं तक के बीच हिमंत बिस्वा सरमा ने खुद को केवल मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि ‘मामा’ के रूप में स्थापित किया। यह एक भावनात्मक जुड़ाव था, जिसने उन्हें एक बड़े महिला वोट बैंक से जोड़ दिया। उनकी अरुणोदयी 2.0 जैसी योजनाओं के जरिए सीधे महिलाओं के खातों में आर्थिक सहायता पहुंची। चुनाव से पहले इन योजनाओं का दायरा और बजट बढ़ाया गया, जिससे ग्रामीण महिलाओं के बीच उनका भरोसा और मजबूत हुआ। इस रणनीति ने उन्हें घर-घर तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई।
‘मियां’ पॉलिटिक्स और ध्रुवीकरण
दूसरी ओर, ‘मियां’ शब्द का इस्तेमाल उन्होंने एक राजनीतिक रणनीति के रूप में किया। असम में बांग्लादेशी घुसपैठ और जनसंख्या संतुलन जैसे मुद्दे लंबे समय से संवेदनशील रहे हैं। हिमंत ने इन विषयों पर सख्त रुख अपनाते हुए ‘नो कॉम्प्रोमाइज’ की छवि बनाई। उन्होंने रैलियों में ‘मियां पॉलिटिक्स’ को निशाना बनाते हुए इसे असमिया पहचान के लिए खतरा बताया। मदरसों को बंद करने और ‘लैंड जिहाद’ जैसे मुद्दों पर कड़ा रुख अपनाने से स्वदेशी और हिंदू मतदाताओं का झुकाव बीजेपी की ओर स्पष्ट रूप से बढ़ा।
विकास और प्रशासनिक छवि
सिर्फ भावनात्मक या राजनीतिक मुद्दों पर ही नहीं, बल्कि विकास के मोर्चे पर भी हिमंत ने खुद को एक सक्रिय और परिणाम देने वाले नेता के रूप में पेश किया। सड़कों का विस्तार, नए मेडिकल कॉलेजों की स्थापना और युवाओं को बिना रिश्वत सरकारी नौकरियां देने जैसे कदमों ने उनकी छवि मजबूत की। उनकी कार्यशैली, जिसमें वे देर रात तक परियोजनाओं की निगरानी करते नजर आते हैं, ने यह संदेश दिया कि सरकार सक्रिय रूप से काम कर रही है। इससे राज्य में किसी बड़े सत्ता विरोधी माहौल का निर्माण नहीं हो पाया।
विपक्ष की कमजोर रणनीति और निष्कर्ष
वहीं कांग्रेस इस चुनाव में प्रभावी चुनौती पेश नहीं कर सकी। गौरव गोगोई विपक्ष का चेहरा होने के बावजूद जमीनी स्तर पर उतनी पकड़ नहीं बना पाए। इसके अलावा, पवन खेड़ा से जुड़े विवाद और AIUDF के साथ गठबंधन न करने जैसे फैसलों ने भी विपक्ष को नुकसान पहुंचाया। कुल मिलाकर, चुनाव नतीजों ने यह संकेत दिया कि ‘डेवलपमेंट, पहचान और भावनात्मक जुड़ाव’ के मिश्रण से हिमंत बिस्वा सरमा ने एक ऐसा मॉडल तैयार किया है, जिसने असम की राजनीति में उनकी पकड़ को और मजबूत कर दिया है।