Homage: Nikon का कैमरा ही इस्तेमाल करते थे रघु राय

Date: 2026-04-27
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आज जब रघु राय सर के इस दुनिया से विदा गये हैं, तो आँखों के सामने स्मृतियों का एक पूरा चलचित्र घूम गया। यह सिर्फ एक महान फोटोग्राफर के जाने की खबर नहीं है, बल्कि मेरे जैसे एक शोधार्थी के लिए उस जीवित ग्रंथ के खो जाने जैसा है, जिससे मैंने 'देखना' सीखा। मेरी यह यात्रा साल 2016 में शुरू हुई थी, जो आज एक दशक का सफर तय कर चुकी है। 

पहली बार सुना नाम

साल 2016 में जब मैं महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा में एम.फिल (M.Phil) का छात्र था, तब पहली बार रघु राय सर का नाम मेरे कानों में पड़ा। मेरे तत्कालीन विभागाध्यक्ष, प्रो. अनिल राय 'अंकित' सर ने मेरी फोटोग्राफी के प्रति रुचि को देखते हुए एक सुझाव दिया। उन्होंने कहा, "अमित, तुम अपने शोध का विषय 'रघु राय की फोटो पत्रकारिता' क्यों नहीं चुनते?" उस समय मैं सिर्फ तस्वीरें खींचता था, लेकिन अंकित सर की उस एक सलाह ने मेरे जीवन की दिशा बदल दी।

रघु राय को जानना

रघु राय एक ऐसा नाम जो उस समय मेरे लिए एक रहस्यमयी महासागर जैसा था। मैंने उनके काम को पढ़ना शुरू किया और यहीं से तस्वीरों के माध्यम से समाज को देखने, सुनने और महसूस करने की मेरी दृष्टि विकसित हुई। शोध के प्रति मेरी गंभीरता का आलम यह था कि उनसे मिलने के लिए मैंने जो प्रश्नावली तैयार की थी, उसे विश्वविद्यालय के पाँच अलग-अलग प्रोफेसरों से जांच करवाया था। मैं एक ऐसी महान शख्सियत के सामने जा रहा था जिसने भोपाल गैस त्रासदी से लेकर बांग्लादेश मुक्ति संग्राम तक को अपनी आँखों से देखा था, इसलिए मैं कोई चूक नहीं करना चाहता था।

एम.फिल के बाद मैंने इस विषय को और विस्तार देने का निर्णय लिया। मैंने वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय (VBSPU), जौनपुर के जनसंचार एवं पत्रकारिता विभाग से अपनी पीएचडी (Ph.D.) शुरू की। मेरा विषय था "सामाजिक यथार्थ का प्रस्तुतीकरण और समकालीन फ़ोटो पत्रकारिता (रघु राय की फोटोपत्रकारिता के विषय के विशेष संदर्भ में)"।

शुरुआत में, जब मैंने 2016 में रघु सर के बारे में जाना था, तो मन में एक मानवीय धारणा थी। मुझे लगा था कि उनके पास संसाधनों की कोई कमी नहीं रही होगी। पिता रेलवे में सरकारी अधिकारी थे, उनके बड़े भाई एस. पॉल जी एक दिग्गज फोटोग्राफर थे और उन्हें बड़े लोगों का साथ मिला, इसलिए वे सफल हो गए। मुझे लगा कि शायद एक प्रभावशाली पृष्ठभूमि ने उन्हें मौका दिया और उनकी तस्वीरें अखबारों में तुरंत छपने लगीं।

रघु राय के साथ इंटर्नशिप

साल 2023 में जब मुझे उनके सानिध्य में एक महीने की इंटर्नशिप करने का मौका मिला, तो मेरे ये सारे भ्रम टूट गए। अमित चौहान सर की मदद से जब मैंने उनके दैनिक कार्य को करीब से देखा, तब समझ आया कि इस सफलता के पीछे कितनी कड़ी तपस्या और समर्पण है। उन्होंने संसाधनों का उपयोग नहीं किया, बल्कि संसाधनों को अपनी दृष्टि से सार्थक बनाया। मैंने देखा कि वे जिस भी संस्थान में रहे, उन्होंने लाखों तस्वीरें लीं। उनके आर्काइव में आज भी कारगिल युद्ध, बांग्लादेश विभाजन और भोपाल गैस त्रासदी की ऐसी अनगिनत तस्वीरें दफन हैं, जो कभी दुनिया के सामने आई ही नहीं। उनका पूरा जीवन एक तपस्वी की तरह रहा है, जिसने अपनी कला के लिए हर सुख का त्याग किया।

कैमरे में इमोशन

एक बार मैंने उनसे पूछा, "सर, जब आप कैमरा आँखों पर लगाते हैं, तो एक परफेक्ट फ्रेम में आप क्या ढूंढते हैं?" वे मुस्कुराए और बोले, "इमोशन (भावना)"। उनका दर्शन बहुत स्पष्ट था-कैमरा कितना भी महँगा या सस्ता हो, वह मायने नहीं रखता। मायने यह रखता है कि आपके भीतर के इमोशन कितने 'महँगे' हैं। वे अक्सर कहते थे, "बच्चे, अच्छी तस्वीरें लेने के लिए तुम्हें अच्छा देखना पड़ेगा, और तुम अच्छा तभी देख पाओगे जब तुम पढ़ोगे।" उनका मानना था कि एक फोटोग्राफर को सिर्फ कैमरे की तकनीक नहीं, बल्कि दुनिया के महान कलाकारों और फोटोग्राफरों के काम को पढ़ना चाहिए। वे रंगीन दुनिया के बीच 'ब्लैक एंड व्हाइट' (काली और सफेद) फोटोग्राफी के मुरीद थे। उनका तर्क था कि शायद ये रंगहीन तस्वीरें ही हैं जो इंसानों के बीच कोई भेदभाव नहीं करतीं। उम्र के 75वें पड़ाव को पार करने के बाद भी उनमें वह ऊर्जा थी, जो एक युवा शोधार्थी के तौर पर मुझे प्रेरित करती थी।

वाराणसी की मुलाक़ात

मुझे वाराणसी का वह वाकया याद आता है जब मेरी पीएचडी का दौर चल रहा था। रघु सर अपनी धर्मपत्नी के साथ एक पुस्तक विमोचन के लिए होटल क्लार्क आए हुए थे। मैं एक कोने में बैठकर उन्हें देख रहा था। जैसे ही मौका मिला, मैंने उनकी पत्नी से बात की और सर से मिलने का समय मांगा। उन्होंने बहुत सहजता से अगले दिन सुबह का समय दे दिया।

अगले दिन जब मुलाकात हुई, तो उन्होंने बड़े प्यार से मेरे शोध पर चर्चा की। बातचीत के बाद उन्हें बाबतपुर एयरपोर्ट जाना था। मैंने उनके लिए एक गाड़ी का इंतजाम किया, लेकिन रास्ते में गाड़ी अचानक खराब हो गई। किसी भी नामी हस्ती के लिए यह झुंझलाहट का सबब हो सकता था, लेकिन रघु सर ने बिना किसी शिकवे के शांत भाव से कहा, "अमित, एक ऑटो रोको।" और हम एक साधारण ऑटो में बैठकर एयरपोर्ट की तरफ निकल पड़े। यह सादगी ही उन्हें 'रघु राय' बनाती थी। उसी सफर में उन्होंने बताया था कि कैसे 1971 में सीमा पर शूटिंग के दौरान एक गोली उनके कान के पास से होकर गुजरी थी। मौत को करीब से देखने के बावजूद उनका कैमरा कभी नहीं काँपा।

Nikon का कैमरा

रघु राय सर के काम की एक और विशिष्ट पहचान यह थी कि वे हमेशा निकोनी (Nikon) कैमरों का ही उपयोग करते थे। उनके हाथ में निकोन का कैमरा किसी जादुई छड़ी की तरह होता था, जो वक्त को रोक देता था। अक्सर लोग कहते हैं कि एक तस्वीर हज़ार शब्दों के बराबर होती है, लेकिन तस्वीरों को शब्द कैसे दिए जाते हैं और एक स्थिर छवि में कहानी कैसे पिरोई जाती है, यह मैंने रघु सर से ही सीखा। आज वे शारीरिक रूप से हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके आर्काइव की वो लाखों अनछपी तस्वीरें और उनकी दी हुई दृष्टि हमेशा हमारे साथ रहेगी। वे कहते थे कि तस्वीरें ही हमारी कहानी बताती हैं और उन लम्हों को हमारे लिए चुरा लेती हैं जिन्हें हम दोबारा नहीं जी सकते।

रघु सर, आपकी विरासत मेरे शोध के पन्नों में ही नहीं, बल्कि मेरे देखने के नज़रिए में हमेशा ज़िंदा रहेगी। विज़ुअल स्टोरीटेलिंग के उस महान गुरु को मेरी भावभीनी श्रद्धांजलि।

 

लेखक-डॉ. अमित मिश्रा

सहायक आचार्य, पत्रकारिता विभाग

वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय (VBSPU), जौनपुर

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