अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी को 2026 के मध्यावधि चुनाव में बड़ा झटका लगा है। डेमोक्रेटिक पार्टी ने सीनेट और हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स यानी प्रतिनिधि सभा, दोनों में बहुमत हासिल कर लिया है। इस नतीजे से अमेरिकी कांग्रेस में सत्ता का समीकरण बदल गया है और ट्रंप के लिए अपने राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
रॉयटर्स और एसोसिएटेड प्रेस की चुनावी रिपोर्टों के अनुसार, इस चुनाव में मतदाताओं की नाराजगी के पीछे कई मुद्दे रहे। महंगाई, ईरान युद्ध, पेट्रोल की बढ़ती कीमतें और सरकार की नीतियों को लेकर असंतोष ने रिपब्लिकन पार्टी की मुश्किलें बढ़ाईं। ट्रंप ने अपनी पार्टी के उम्मीदवारों के समर्थन में रैलियां कीं और मतदाताओं से उन्हें इस तरह वोट देने की अपील की, जैसे चुनाव खुद वह लड़ रहे हों। इसके बावजूद पार्टी को अपेक्षित कामयाबी नहीं मिली।
आखिर वे कौन से मुद्दे थे, जिन्होंने ट्रंप और रिपब्लिकन पार्टी के खिलाफ माहौल बनाया? चुनावी नतीजों के पीछे छह प्रमुख कारण सामने आए हैं।
1. ईरान युद्ध से ट्रंप की विदेश नीति पर उठे सवाल
ईरान के साथ बढ़ता सैन्य संघर्ष ट्रंप प्रशासन के लिए बड़ी राजनीतिक चुनौती बन गया। युद्ध को लेकर अमेरिकी मतदाताओं के एक बड़े वर्ग में असहमति दिखाई दी। ट्रंप से विदेश नीति में स्थिरता की उम्मीद की जा रही थी, लेकिन ईरान के साथ संघर्ष ने सरकार के सामने नई मुश्किलें खड़ी कर दीं।
यूनिवर्सिटी ऑफ मैसाचुसेट्स एमहर्स्ट के अगस्त 2026 के सर्वेक्षण में 68 प्रतिशत लोगों ने ईरान युद्ध को संभालने के ट्रंप के तरीके पर असहमति जताई। वहीं, 54 प्रतिशत लोगों ने ईरान में अमेरिकी सैन्य कार्रवाई का विरोध किया।
इस संघर्ष का असर विदेश नीति तक सीमित नहीं रहा। ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता बढ़ने से आर्थिक दबाव भी महसूस किया गया। डेमोक्रेट्स ने चुनाव प्रचार के दौरान इस मुद्दे को उठाकर ट्रंप प्रशासन की नीतियों पर सवाल खड़े किए। इस तरह ईरान युद्ध रिपब्लिकन पार्टी के लिए चुनावी नुकसान की एक बड़ी वजह बना।
2. पेट्रोल की कीमतों में बढ़ोतरी से बढ़ा आर्थिक दबाव
ईरान युद्ध का असर तेल और गैस की कीमतों पर भी पड़ा। अमेरिका में पेट्रोल की कीमतें आम मतदाताओं के लिए अहम मुद्दा हैं, क्योंकि बड़ी संख्या में लोग रोजाना कार से काम पर जाते हैं। ऐसे में ईंधन महंगा होने का सीधा असर उनके खर्च पर पड़ता है।
ईरान से जुड़े संघर्ष और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर बनी अनिश्चितता ने अंतरराष्ट्रीय तेल आपूर्ति की चिंताएं बढ़ाईं। इसका असर अमेरिकी बाजार में भी दिखाई दिया।
रिपोर्ट के मुताबिक, अक्तूबर के आखिरी सप्ताह में अमेरिका में गैसोलीन की औसत कीमत 4.27 डॉलर प्रति गैलन तक पहुंच गई थी। यह ट्रंप के दूसरे कार्यकाल की शुरुआत के समय की कीमत से अधिक थी। इससे उनके आर्थिक वादों पर सवाल उठने लगे। मतदाताओं के सामने यह सवाल था कि ऊर्जा की बढ़ती कीमतों से राहत दिलाने के सरकार के दावे कितने प्रभावी रहे।
3. महंगाई और जीवनयापन की लागत बनी बड़ी परेशानी
2024 के राष्ट्रपति चुनाव में ट्रंप ने महंगाई कम करने और अमेरिकी परिवारों की आर्थिक स्थिति बेहतर बनाने का वादा किया था। लेकिन 2026 के मध्यावधि चुनाव तक महंगाई और रोजमर्रा के खर्च का मुद्दा मतदाताओं की चिंता बना रहा।
पेट्रोल के अलावा किराने का सामान, बिजली, आवास और स्वास्थ्य सेवाओं पर होने वाला खर्च भी परिवारों के बजट पर दबाव डाल रहा था।
रॉयटर्स की चुनावी रिपोर्ट के अनुसार, करीब 90 प्रतिशत मतदाताओं ने जीवनयापन की लागत को वोट देने के लिहाज से महत्वपूर्ण मुद्दा माना। लगभग दो-तिहाई मतदाताओं ने ऊंची कीमतों के लिए ट्रंप को जिम्मेदार ठहराया।
एसोसिएटेड प्रेस की वोटर पोल रिपोर्ट में भी अर्थव्यवस्था और महंगाई को चुनावी फैसले के प्रमुख कारणों में शामिल किया गया। डेमोक्रेट्स ने इसी मुद्दे को आधार बनाकर ट्रंप प्रशासन को घेरा और मतदाताओं के बीच अपनी बात रखी।
4. निर्वासन नीति से स्वतंत्र और मध्यमार्गी मतदाताओं में नाराजगी
ट्रंप की राजनीति में अवैध प्रवासियों को देश से बाहर निकालने और इमिग्रेशन नियम सख्त करने की नीति प्रमुख रही है। हालांकि, इस नीति के तरीके और उसके मानवीय प्रभावों को लेकर अमेरिकी मतदाताओं के बीच मतभेद भी देखने को मिले।
ट्रंप के समर्थक इसे सीमा सुरक्षा और कानून व्यवस्था के लिए जरूरी मानते रहे, लेकिन कई मतदाताओं ने निर्वासन की प्रक्रिया और सरकार के सख्त रवैये पर सवाल उठाए।
22 अप्रैल 2026 को प्रकाशित रॉयटर्स/इप्सोस सर्वेक्षण में 52 प्रतिशत अमेरिकी नागरिकों ने कहा कि ट्रंप की निर्वासन नीति का समर्थन करने वाले उम्मीदवार को वोट देने की उनकी संभावना कम होगी। इसके मुकाबले 42 प्रतिशत लोगों ने ऐसी नीति का समर्थन करने वाले उम्मीदवार को वोट देने की अधिक संभावना जताई।
स्वतंत्र मतदाताओं में भी इस नीति को लेकर विरोध ज्यादा दिखाई दिया। ऐसे में रिपब्लिकन उम्मीदवारों के लिए स्वतंत्र और मध्यमार्गी मतदाताओं का समर्थन हासिल करना मुश्किल हुआ।
5. एपस्टीन फाइल्स के मुद्दे पर रिपब्लिकन नेताओं की घेराबंदी
जेफ्री एपस्टीन से जुड़े दस्तावेजों का विवाद भी चुनाव प्रचार में अहम मुद्दा बना। एपस्टीन एक दोषी यौन अपराधी था। प्रभावशाली लोगों से उसके संबंधों और मामले की जांच से जुड़े दस्तावेजों को लेकर अमेरिकी राजनीति में विवाद बना रहा।
डेमोक्रेटिक उम्मीदवारों ने एपस्टीन फाइल्स जारी करने के मुद्दे पर रिपब्लिकन नेताओं को निशाना बनाया। जॉर्जिया में जॉन ओसॉफ ने अपने रिपब्लिकन प्रतिद्वंद्वी माइक कॉलिन्स पर सवाल उठाए। ओहायो में शेरोड ब्राउन के प्रचार के दौरान रिपब्लिकन उम्मीदवार जॉन हस्टेड के एपस्टीन से जुड़े दानदाताओं के संबंधों का मुद्दा उठाया गया।
वहीं, टेक्सास में जेम्स टालारिको ने केन पैक्सटन के खिलाफ एपस्टीन मामले से जुड़ी भाषा का इस्तेमाल कर प्रचार किया।
प्रतिस्पर्धी चुनावी क्षेत्रों में एपस्टीन का जिक्र करने वाले विज्ञापनों पर डेमोक्रेट्स ने करीब 53 मिलियन डॉलर खर्च किए। वहीं, रिपब्लिकन की ओर से इस तरह के विज्ञापनों पर करीब 3 मिलियन डॉलर खर्च किए गए।
इस मुद्दे के जरिए डेमोक्रेट्स ने भ्रष्टाचार, अमीरों को मिलने वाली विशेष सुविधाओं और सत्ता के दुरुपयोग की धारणा को मतदाताओं के सामने रखा।
6. रिपब्लिकन समर्थकों में मतदान को लेकर कम उत्साह
चुनाव में केवल सरकार के खिलाफ नाराजगी ही नतीजे तय नहीं करती, बल्कि यह भी मायने रखता है कि किसी पार्टी के समर्थक कितनी सक्रियता से मतदान करते हैं। 2026 के मिडटर्म चुनाव में डेमोक्रेटिक समर्थकों की चुनावी सक्रियता रिपब्लिकन समर्थकों से अधिक रही।
डेमोक्रेटिक उम्मीदवारों के समर्थक, रिपब्लिकन समर्थकों की तुलना में 14 प्रतिशत अधिक संख्या में यह कह रहे थे कि उन्होंने चुनाव को लेकर गंभीरता से विचार किया है। वहीं, बेहद उत्साहित होकर वोट देने की इच्छा जताने वाले डेमोक्रेटिक समर्थकों की संख्या 17 प्रतिशत अधिक थी।
सीबीएस न्यूज के एग्जिट पोल में भी सामने आया कि रिपब्लिकन मतदाताओं के लिए ट्रंप का समर्थन पहले के मुकाबले कम महत्वपूर्ण हो गया था। इसके विपरीत, डेमोक्रेटिक मतदाताओं में ट्रंप के विरोध में वोट देने की प्रेरणा ज्यादा मजबूत थी।
इस तरह चुनाव में डेमोक्रेट्स को अपने समर्थकों की अधिक सक्रियता का फायदा मिला, जबकि रिपब्लिकन खेमे में मतदान को लेकर उत्साह अपेक्षाकृत कम रहा।
ट्रंप के लिए आगे की राह हुई चुनौतीपूर्ण
2026 के मध्यावधि चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी को मिले झटके के पीछे किसी एक मुद्दे की भूमिका नहीं रही। ईरान युद्ध, महंगाई, पेट्रोल की बढ़ती कीमतें, निर्वासन नीति, एपस्टीन फाइल्स और मतदाताओं की चुनावी सक्रियता जैसे कई कारकों ने नतीजों को प्रभावित किया। दोनों सदनों में डेमोक्रेट्स के बहुमत के बाद अब ट्रंप के सामने अपने बचे हुए कार्यकाल में राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाने की नई चुनौती होगी।