यूपी की सियासत में नए संकेत: बृजभूषण-धनंजय की नजदीकी और संजय निषाद का दर्द

Authored By: News Corridors Desk | 24 Mar 2026, 02:29 PM
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उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले हलचल तेज होती दिख रही है। हाल के घटनाक्रमों ने यह साफ संकेत दिया है कि आने वाले समय में सियासी समीकरणों में बड़ा बदलाव संभव है। जौनपुर, गोरखपुर और पूर्वांचल के अलग-अलग मंचों से निकली तीन बड़ी खबरें प्रदेश की राजनीति की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकती हैं।

पहली बड़ी खबर जौनपुर से सामने आई, जहां ‘बैस क्षत्रिय एकता मंच’ के कार्यक्रम में दो प्रभावशाली नेता बृजभूषण शरण सिंह और धनंजय सिंह एक साथ नजर आए। इस दौरान सबसे चर्चित दृश्य वह रहा जब धनंजय सिंह खुद गाड़ी चलाकर बृजभूषण के साथ पहुंचे। मंच से बृजभूषण ने अपने पुराने तेवर में ‘दबदबा था, है और रहेगा’ जैसा बयान दिया, जिससे उनके राजनीतिक आत्मविश्वास का अंदाजा लगाया जा सकता है। दोनों नेताओं की यह नजदीकी इसलिए भी अहम मानी जा रही है क्योंकि ये भाजपा के करीब होते हुए भी स्वतंत्र राजनीतिक प्रभाव रखते हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि पूर्वांचल और अवध के ये दो बड़े चेहरे साथ आते हैं, तो 2027 में भाजपा के लिए चुनौती खड़ी हो सकती है।

दूसरी बड़ी खबर गोरखपुर से जुड़ी है, जहां प्रदेश सरकार के कैबिनेट मंत्री संजय निषाद एक कार्यक्रम के दौरान भावुक होकर रो पड़े। उनके आंसुओं के पीछे केवल व्यक्तिगत भावनाएं नहीं, बल्कि एक बड़ा सामाजिक और राजनीतिक मुद्दा छिपा है। संजय निषाद लंबे समय से निषाद, मल्लाह और बिंद समाज को अनुसूचित जाति का दर्जा दिलाने की मांग कर रहे हैं। हालांकि इस दिशा में अब तक कोई ठोस प्रगति नहीं हुई है। इसके अलावा, राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा है कि वह सरकार में अपनी पार्टी की भूमिका और हिस्सेदारी को लेकर भी असंतुष्ट हैं। उनके आंसू इस बात का संकेत हैं कि निषाद समाज की अपेक्षाएं और सियासी दबाव लगातार बढ़ रहे हैं।

तीसरी अहम बात क्षत्रिय राजनीति के बदलते स्वरूप को लेकर सामने आई है। जहां एक ओर बृजभूषण और धनंजय सिंह के बीच नजदीकियां बढ़ रही हैं, वहीं राजा भैया की इन आयोजनों से दूरी कई सवाल खड़े कर रही है। गोंडा और जौनपुर जैसे महत्वपूर्ण कार्यक्रमों में उनकी अनुपस्थिति को राजनीतिक हलकों में नए गुटबंदी के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है। इसके साथ ही बृजभूषण और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बीच कथित दूरी भी इस पूरे समीकरण को और जटिल बनाती है।

कुल मिलाकर, उत्तर प्रदेश की राजनीति में यह तीनों घटनाएं इस बात की ओर इशारा करती हैं कि 2027 का चुनाव केवल पार्टियों के बीच नहीं, बल्कि प्रभावशाली चेहरों और सामाजिक समीकरणों के बीच भी लड़ा जाएगा। आने वाले समय में इन नेताओं के कदम और उनके गठजोड़ प्रदेश की राजनीति की नई दिशा तय कर सकते हैं।