Navratri 2026: नवरात्रि में कब करें कन्या पूजन? जानें सही तिथि, नियम और विधि

Authored By: News Corridors Desk | 26 Mar 2026, 02:17 PM
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शक्ति उपासना का पावन पर्व नवरात्रि पूरे देश में श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है। इन नौ दिनों में भक्त मां दुर्गा के नौ अलग-अलग स्वरूपों की पूजा करते हैं। नवरात्रि का समापन कन्या पूजन के साथ होता है, जिसे धार्मिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना गया है। शास्त्रों के अनुसार, कन्या पूजन के बिना देवी की आराधना अधूरी मानी जाती है।

नवरात्रि के दौरान कई लोग अष्टमी तो कई लोग नवमी के दिन कन्या पूजन करते हैं। ऐसे में अक्सर यह सवाल उठता है कि आखिर कन्या पूजन की सही तिथि कौन-सी है और इसे किस विधि से करना चाहिए। इस विषय पर काशी के विद्वानों ने विस्तार से जानकारी दी है बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के ज्योतिष विभाग के प्रोफेसर पंडित सुभाष पांडेय के अनुसार, नवरात्रि में 2 से 10 वर्ष तक की कन्याओं के पूजन का विधान बताया गया है। धर्म ग्रंथ धर्म सिंधु में भी इस विषय पर विस्तृत उल्लेख मिलता है। इसमें कहा गया है कि इन कन्याओं को देवी के विभिन्न स्वरूपों का प्रतीक माना जाता है और उनके पूजन से अलग-अलग प्रकार के फल प्राप्त होते हैं।

धार्मिक मान्यता के अनुसार, नवरात्रि के नौ दिनों में प्रतिदिन एक-एक कन्या का पूजन करना सर्वोत्तम माना गया है। हालांकि, आज के व्यस्त जीवन में यह सभी के लिए संभव नहीं हो पाता। ऐसे में शास्त्रों ने विकल्प भी दिया है कि जो लोग प्रतिदिन कन्या पूजन नहीं कर सकते, वे अष्टमी या नवमी के दिन यह पूजन कर सकते हैं। लेकिन अगर “सही और श्रेष्ठ तिथि” की बात करें, तो विद्वानों के अनुसार नवमी का दिन अधिक उत्तम माना गया है। पंडित सुभाष पांडेय बताते हैं कि अष्टमी पर कन्या पूजन करना परंपरा का हिस्सा जरूर है, लेकिन शास्त्रीय दृष्टि से नवमी तिथि अधिक उचित है। इस दिन हवन और पूजन की पूर्णाहुति के बाद विधि-विधान से कन्या पूजन करना चाहिए।

कन्या पूजन की विधि भी बहुत महत्वपूर्ण होती है। सबसे पहले घर में कन्याओं को आमंत्रित किया जाता है, जिन्हें देवी का स्वरूप मानकर सम्मान दिया जाता है। जब कन्याएं घर आती हैं, तो उनके चरणों को साफ पानी से धोया जाता है। इसके बाद उनके पैरों में महावर (आलता) लगाया जाता है, जो शुभता का प्रतीक है। इसके बाद कन्याओं को साफ और पवित्र स्थान पर बैठाया जाता है। फिर उन्हें पूड़ी, हलवा और चने का प्रसाद (जिसे ‘भोग’ कहा जाता है) प्रेमपूर्वक परोसा जाता है। भोजन कराने के बाद उनकी आरती उतारी जाती है और उनसे आशीर्वाद लिया जाता है।

कन्या पूजन के दौरान एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि कन्याओं के साथ एक छोटे बालक (जिसे ‘लंगूर’ या ‘भैरव’ का रूप माना जाता है) को भी बैठाकर भोजन कराया जाता है। यह परंपरा कई जगहों पर निभाई जाती है और इसे भी शुभ माना जाता है। पूजन के अंत में कन्याओं को उपहार देना भी आवश्यक माना गया है। इसमें कपड़े, फल, मिठाई या दक्षिणा दी जा सकती है। यह विदाई का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होता है, जिससे कन्या रूपी देवी प्रसन्न होकर घर से विदा होती हैं।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जो भक्त सच्चे मन से नवरात्रि का व्रत रखते हैं और विधि-विधान से कन्या पूजन करते हैं, उनकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। मां दुर्गा अपने भक्तों पर कृपा बरसाती हैं और उनके जीवन में सुख-समृद्धि लाती हैं। इस तरह, नवरात्रि में कन्या पूजन न केवल एक धार्मिक परंपरा है, बल्कि यह समाज में नारी शक्ति के सम्मान का भी प्रतीक है। यह हमें सिखाता है कि छोटी-छोटी कन्याओं में भी देवी का वास माना जाता है और उनका सम्मान करना हमारी संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है।

यदि आप नवरात्रि में कन्या पूजन करना चाहते हैं, तो कोशिश करें कि नवमी के दिन पूरे विधि-विधान से यह पूजन करें। हालांकि, अष्टमी पर भी इसे किया जा सकता है। सबसे जरूरी बात यह है कि पूजन श्रद्धा और विश्वास के साथ किया जाए—क्योंकि सच्ची भक्ति ही देवी को सबसे अधिक प्रिय होती है।