सेंट्रल विस्टा के लिए हटाई जाएगी 100 साल पुरानी मस्जिद, ओवैसी ने उठाए सवाल

सेंट्रल विस्टा के लिए हटाई जाएगी 100 साल पुरानी मस्जिद, ओवैसी ने उठाए सवाल
  • सेंट्रल विस्टा के तहत नए सचिवालय भवनों का होना है निर्माण
  • सरकार ने 1940 के समझौते को बताया अस्थायी कब्जे का आधार
  • हाईकोर्ट ने पूछा- सरकारी परिसर में प्रार्थना स्थल पर रोक का नियम क्या है
  • ओवैसी ने सरकार के धर्मनिरपेक्षता संबंधी तर्क पर उठाए सवाल

Qadeemi Masjid Central Vista Project: दिल्ली के कृषि भवन परिसर में स्थित 100 साल से अधिक पुरानी कदीमी मस्जिद को सेंट्रल विस्टा पुनर्विकास परियोजना के तहत हटाया जा सकता है। केंद्र सरकार ने दिल्ली हाईकोर्ट में दाखिल स्टेटस रिपोर्ट में कहा है कि मस्जिद की स्थायी संरचना सरकारी संपत्ति के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप के अनुकूल नहीं है। सरकार के मुताबिक, कृषि भवन और शास्त्री भवन की जगह कॉमन सेंट्रल सेक्रेटेरिएट (CCS) की नई इमारतें बनाई जानी हैं और मस्जिद परियोजना के निर्धारित स्थल पर स्थित है। इसलिए इसे हटाना जरूरी है। इस मामले पर एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने भी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने सरकार के तर्क पर सवाल उठाते हुए कहा कि सेंट्रल विस्टा के भूमि पूजन में धार्मिक अनुष्ठान से धर्मनिरपेक्षता प्रभावित नहीं हुई, लेकिन पुरानी मस्जिद को लेकर ऐसा तर्क दिया जा रहा है।

सरकारी जमीन और 1940 के समझौते का हवाला

आवास एवं शहरी कार्य मंत्रालय के भूमि एवं विकास कार्यालय (एलएंडडीओ) की ओर से दाखिल रिपोर्ट में कहा गया है कि कदीमी मस्जिद कृषि भवन परिसर के प्लॉट नंबर 120, डॉ. राजेंद्र प्रसाद रोड पर स्थित है। जमीन केंद्र सरकार के स्वामित्व और प्रशासनिक नियंत्रण में है। सरकार ने 8 नवंबर 1940 को हुए समझौते का हवाला देते हुए कहा कि मस्जिद की देखरेख करने वाली समिति को परिसर का इस्तेमाल केवल मस्जिद के रूप में करने की अनुमति दी गई थी। उसे जमीन पर मालिकाना हक या कोई स्थायी कानूनी अधिकार नहीं दिया गया था।

केंद्र ने यह भी कहा कि सरकारी कार्यालय परिसर में किसी स्थायी धार्मिक संरचना को बनाए रखना उचित नहीं है। केंद्रीय प्रशासनिक क्षेत्र की सार्वजनिक जमीन को किसी स्थायी धार्मिक आरक्षण के लिए निर्धारित नहीं किया जा सकता। सरकार के अनुसार, मस्जिद के कारण प्रस्तावित पुनर्विकास योजना के तहत निर्माण कार्य प्रभावित होगा।

अनुच्छेद 25 के दावे पर केंद्र की दलील

सरकार ने धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार से जुड़े संविधान के अनुच्छेद 25 का हवाला देकर मस्जिद को मौजूदा स्थान पर बनाए रखने की मांग को भी स्वीकार नहीं किया। रिपोर्ट में कहा गया है कि धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार किसी व्यक्ति या समिति को सरकारी जमीन पर किसी विशेष स्थान पर ही पूजा करने का पूर्ण अधिकार नहीं देता। केंद्र ने विकल्प के तौर पर इंडिया गेट के पास स्थित शाही मस्जिद जाब्ता गंज का उल्लेख किया है। सरकार के मुताबिक, यह मस्जिद कृषि भवन से करीब दो किलोमीटर के दायरे में है और नमाज अदा करने के इच्छुक लोगों के लिए उपलब्ध है।

हाईकोर्ट ने पूछा- प्रार्थना स्थल पर रोक का नियम क्या है?

कदीमी मस्जिद की देखरेख करने वाली समिति ने सितंबर में दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर मस्जिद को तोड़े जाने या हटाए जाने से सुरक्षा की मांग की थी। समिति का कहना है कि आजादी के बाद से ही कृषि भवन और आसपास के सरकारी कार्यालयों में काम करने वाले कर्मचारी यहां नमाज अदा करते रहे हैं। समिति ने मस्जिद को मौजूदा स्थान पर बनाए रखने या नई इमारतों में वैकल्पिक प्रार्थना स्थल उपलब्ध कराने की मांग की है। उसने अदालत में यह भी स्पष्ट किया कि वह सेंट्रल विस्टा परियोजना का काम रुकवाना नहीं चाहती।

दो नवंबर को मामले की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति अनीश दयाल ने केंद्र सरकार के वकील से पूछा कि क्या कोई ऐसा स्पष्ट नियम है, जिसके तहत सरकारी परिसर में किसी समुदाय के लिए प्रार्थना की जगह नहीं हो सकती। अदालत ने केंद्र के वकील को यह सवाल अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल तक पहुंचाने को कहा। मस्जिद समिति को केंद्र की रिपोर्ट पर जवाब दाखिल करने का समय दिया गया है। मामले की अगली सुनवाई 23 नवंबर को होगी। फिलहाल अदालत ने मस्जिद को हटाने का कोई अंतिम आदेश नहीं दिया है।

ओवैसी बोले- धर्मनिरपेक्षता की व्याख्या पर उठते हैं सवाल

एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर पोस्ट कर केंद्र सरकार की दलील की आलोचना की। उन्होंने कहा कि कदीमी मस्जिद वर्ष 1912 से पहले से मौजूद है, यानी कृषि भवन के निर्माण से भी पहले की है। ओवैसी ने सेंट्रल विस्टा परियोजना के भूमि पूजन का उल्लेख करते हुए सवाल किया कि एक ओर सार्वजनिक परियोजना के उद्घाटन में एक धर्म के अनुष्ठानों से धर्मनिरपेक्षता प्रभावित नहीं होती, वहीं दूसरी ओर दशकों पुरानी मस्जिद को सरकारी संपत्ति के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप के विपरीत बताया जा रहा है।

ओवैसी की यह प्रतिक्रिया केंद्र की स्टेटस रिपोर्ट और मस्जिद को हटाने संबंधी दलीलों के बाद आई है। अब इस मामले में 23 नवंबर को होने वाली सुनवाई महत्वपूर्ण होगी, जिसमें मस्जिद समिति केंद्र के जवाब पर अपना पक्ष रखेगी और अदालत के सामने सरकारी परिसर में धार्मिक सुविधाओं से जुड़े सवाल पर आगे की दलीलें रखी जा सकती हैं।