परीक्षाओं के पेपर लीक को लेकर देश की राजधानी में चल रहा आंदोलन खत्म हो गया है। केंद्र की मोदी सरकार के बारह साल के इतिहास में पहली बार जनदबाव के कारण किसी मंत्री को पद से इस्तीफा देना पड़ा। इस आंदोलन की समाप्ति कोई सामान्य नहीं है। हाल के वर्षों में ऐसा कोई जनान्दोलन नहीं हुआ जिसमें सरकार ने आंदोलनकारियों की सभी मांगे मान ली हों और उसके बाद वह आंदोलन खामोशी के साथ खत्म हो गया हो। आज़ाद भारत में सबसे बड़ा आंदोलन जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में हुआ संपूर्ण क्रांति आंदोलन माना जाता है। लेकिन उस आंदोलन के भी उद्देश्य की पूर्ति सरकार के मानने से नहीं हुई थी बल्कि जनता ने उस आंदोलन के उद्देश्यों की पूर्ण किया था।
जंतर मंतर पर जो आंदोलन शुरू हुआ जयप्रकाश नारायण जैसा कोई वेटरन रहनुमाई नहीं कर रहा था। आंदोलन की कमान एक ऐसे युवा के हाथ में थी जो अचानक विदेश से आया और उसने छात्रों और युवाओं के लिए लड़ाई छेड़ दी। इस आंदोलन में गुरुता तब आई जब लद्दाख के सोशल एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक का आगमन हुआ। वांगचुक के आंदोलन में शामिल होने और अनशन शुरू करने के बाद इसने तेजी पकड़ी। जंतर मंतर पर युवाओं का जमघट बढ़ने लगा। राजनीतिक दलों के नेता पहले इक्का दुक्का पहुंचे लेकिन जब उन्होंने देखा की आंदोलन के पक्ष में एक बड़ा जनमत बनने लगा है तो उनके समर्थन की तादात भी बढ़ने लगी। इसके साथ ही समाज का वह तबका भी इसमें उतर गया जो क्रिएटिव दुनिया से नाता रखता है। विभिन्न छात्र संगठनों के साथ ही सामाजिक संगठनों के सदस्य भी इसमें पहुँच गये। लोगों की भीड़ 2012 के अन्ना हजारे आंदोलन की याद दिलाने लगी। लेकिन इस बार एक बात कुछ अलग थी। पूरी लड़ाई युना लड़ रहे थे जिसे सब लोग जेन-जी कह रहे हैं। इस आंदोलन का नेतृत्व एक ऐसा संगठन कर रहा था जिसका प्रादुर्भाव हुए जुम्मा-जुम्मा कुछ ही दिन हुए थे। संगठन का नाम भी एक टिप्पणी से निकला था। जब आंदोलन का नेतृत्व कर रही कॉकरोच जनता पार्टी 20 जुलाई को संसद कूच का आह्वान किया तो देश के विभिन्न कोनों से लोग इसमें हिस्सा लेने के लिए देश की राजधानी पहुँच गए।
बीस जुलाई को आंदोलनकारी संसद तक तो नहीं पहुँच पाये लेकिन उनके आंदोलन ने संसद में भी उबाल ला दिया।इस दिन आंदोलनकारियों को रोकने के लिए पुलिस ने जो बल प्रयोग किया जब उसके वीडियो और युवाओं की बनाई रील देश दुनिया में लोगों के मोबाइल तक पहुंचने लगे तो अचानक एक बड़ा जनमत युवाओं और छात्रों के हितों के पक्ष में बनने लगा।विपक्षी दल खुलकर आंदोलनकारियों के समर्थन में खड़े हो गये। संसद ठप हो गई। संसद के भीतर और संसद के बाहर से पड़ रहे दबाव को सरकार महसूस करने लगी। सरकार ने आंदोलन को खत्म कराने के लिए प्रयास करने लगी। इस काम में उसने अपने दो मंत्रियों जयप्रकाश नड्डा और जितेन्द्र सिंह को लगाया। पर्दे के पीछे भी प्रयास शुरू हुए। सरकार की तरफ़ से लगाये गये दोनों मंत्री धरना स्थल से पुलिस द्वारा उठाकर अस्पताल में भर्ती कराये सोनम वांगचुक से मिले। सरकार के सामने आंदोलनकारियों की मांगे आईं। पहली माँग केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा, दूसरी नीट की तैयारी करने वाले उन छात्र-छात्राओं के परिवारों को मुआवजा जिन्होंने आत्महत्या कर ली, तीसरी बीस जुलाई के प्रर्शन में शामिल युवाओं पर दर्ज मुकदमें खत्म किये जायें। इन तीन प्रमुख मांगों के साथ ही परीक्षाओं के पेपर लीक को रोकने के लिए ठोस सिस्टमेटिक उपाय सरकार की तरफ़ से किया जाये।
युना आंदोलनकारियों की तरफ़ से सभी बातें साफ़ होने के बा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मामले को डील करना शुरू किया। उन्होंने सबसे पहले नीम पेपर लीक के बाद अपनी सरकार की तरफ़ से उठाये गये कदमों को स्वयं जनता के सामने रखा। इसके बाद उन्होंने एक वीडियो जारी कर पेपर लीक के दोषियों को कड़ी सजा दिलाने के लिए कानूनी सुधार का ऐलान किया और आश्वासन दिया कि मौजूदा मानसून सत्र में ही यह कड़ा क़ानून पारित कराने का आश्वासन दिया। इसके एक दिन बाद उन्होंने अपने वीडियो के बाद मिली प्रतिक्रियाओं पर लोगों को धन्यवाद देते हुए एक वीडियो रील जारी किया। इससे पहले उनकी तरफ़ से लगाये गये मंत्रियो की कॉकरोच जनता पार्टी के प्रतिनिधियों से बातचीत में कुछ सहमति बन चुकी थी। प्रधानमंत्री के धन्यवाद वीडियो के बाद देर रात सरकार ने सोनम वांगचुक का अनशन तुड़वाकर सफलता की तरफ़ एक और क़दम बढ़ा लिया। अब मसला सिर्फ केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे पर फंसा था। लेकिन शनिवार को यह पेंच भी खत्म हो गया और धर्मेन्द्र प्रधान ने अपने पद से त्यागपत्र प्रधानमंत्री को भेज दिया।
जेन-जी के आंदोलन को सफलतापूर्वक खत्म कराकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश दुनिया को बड़ा संदेश दिया है। दरअसल मोदी सरकार पर विपक्ष लगातार लोकतंत्र का गला घोंटने का आरोप लगाता रहा है। किसान आंदोलन और सीएए आंदोलन के बिपरीत इस बार मोदी सरकार ने वक्त पर आंदोलनकारियों की बात मानकर यह साफ़ संदेश दिया कि वह लोकतांत्रिक मूल्यों को मानती है जिसमें जनमत का सम्मान सर्वोपरि है। साथ ही यह संदेश कि उनकी सरकार में भारत में लोकतंत्र सुरक्षित है। प्रधानमंत्री ने दूसरा बड़ा संदेश ये दिया कि उन्हें और उनकी सरकार को देश के युवाओं की न सिर्फ सबसे ज्यादा चिंता है बल्कि वह उनकी भावनाओं की कद्र भी करती है। तीसरा बड़ा संदेश शिक्षा मंत्री का इस्तीफा लेकर दिया कि सरकार जिद्दी नहीं है। वह वाजिब माँग पर झुकने को तैयार है। चौथा यह की इस आंदोलन के पहले सरकार को लेकर जो ग़ुबार युवाओं के मन में भर गया था वह इसके शांतिपूर्ण तरीके से खत्म होने से कम होगा। पांचवां यह की अपने इस क़दम से सरकार युवा जनमत को अपने साथ जोड़ने में सफल होगी।
मोदी सरकार शुरुआती हिचकिचाहट के बाद जिस तरह से संसद में परीक्षा पेपर लीक पर संसद में चर्चा कराने को तैयार दिखाई दी उससे उसका राजनीतिक मंतव्य साफ़ झलक रहा है। वह विपक्ष को ही इस मामले में कठघरे में खड़ा करने की कोशिश में है कि विपक्ष ख़ुद चर्चा नहीं चाहता है। सरकार संदेश देना चाहती है कि वह संसदीय परम्पराओं और मर्यादाओं का पालन करती है लेकिन विपक्ष ही इसे तोड़ रहा है। ऐसे में विपक्षी दलों को अपनी रणनीति पर विचार करना होगा।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)