मोदी कोई फैसला यूं ही नहीं ले लेते, पत्रकार-लेखक अरविंद चतुर्वेदी के नज़रिए से जानिए निर्णय लेने की शैली।

मोदी कोई फैसला यूं ही नहीं ले लेते, पत्रकार-लेखक अरविंद चतुर्वेदी के नज़रिए से जानिए निर्णय लेने की शैली।

न्यूज कोरिडोर की टीम से एक इंटरव्यू के दौरान अरविंद चतुर्वेदी ने प्रधानमंत्री के वाराणसी से संबंध, व्यक्तित्व, काम करने के तरीके और युवाओं के लिए सीख पर अपने अनुभव साझा किए। 

सवाल: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का वाराणसी से जुड़ाव किस तरह का है? क्या यह रिश्ता सिर्फ राजनीतिक है या इसके पीछे कोई गहरी व्यक्तिगत भावना भी है?

जवाब: वाराणसी का नरेंद्र मोदी से रिश्ता केवल एक लोकसभा सीट या राजनीतिक क्षेत्र तक सीमित नहीं है। जब वह काशी और बाबा विश्वनाथ के मंदिर जाते हैं, तो ऐसा लगता है कि वह पूरी तरह भक्ति में डूब जाते हैं। मेरी समझ में यह शहर उनके लिए गहरे आध्यात्मिक महत्व रखता है। काशी में मृत्यु को भी मुक्ति से जोड़ा जाता है। बाबा विश्वनाथ की नगरी के प्रति यह भावनात्मक जुड़ाव उनके लिए विशेष महत्व रखता है। मैं स्वयं वाराणसी में पला-बढ़ा हूं। मेरा घर गंगा के किनारे है, इसलिए मैं इस शहर के आकर्षण और उसकी आत्मा को अच्छी तरह समझता हूं। गंगा और बाबा विश्वनाथ मिलकर वाराणसी को उसका विशिष्ट स्वरूप देते हैं।
मोदी ने इन दोनों के बीच संपर्क को बेहतर बनाने पर काम किया। अब गंगा से काशी विश्वनाथ मंदिर तक सीधे पहुंचने की सुविधा विकसित हुई है।

 काशी विश्वनाथ कॉरिडोर और बदलता बनारस

सवाल: वाराणसी में हुए विकास कार्यों को आप किस तरह देखते हैं?

जवाब: काशी विश्वनाथ मंदिर परिसर का पुनर्विकास कोविड काल के दौरान हुआ। इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था में भी बदलाव आया।
पहले वाराणसी एयरपोर्ट से शहर के भीतर पहुंचने में चार-पांच घंटे तक लग सकते थे, खासकर जब कोई कोलकाता या मुंबई से आता था। अब कनेक्टिविटी और मंदिर तक पहुंचने की व्यवस्था में काफी बदलाव आया है।
काशी की गलियां बहुत संकरी हैं। गुजरात का वडनगर, जहां मोदी का घर ऐसी ही गलियों में स्थित है, उससे भी कुछ समानता रखता है। संभव है कि इस तरह का परिचित वातावरण वाराणसी से उनके जुड़ाव का एक कारण रहा हो।

सवाल: क्या वडनगर और वाराणसी की गलियों के बीच समानता ने भी उन्हें प्रभावित किया होगा?

जवाब: यह एक संभावित कारण हो सकता है। दोनों जगहों की गलियों और पुराने शहर के वातावरण में कुछ समानताएं हैं। वडनगर की अपनी गलियों से वाराणसी का माहौल उन्हें बचपन की याद दिलाता हो, ऐसा समझा जा सकता है।

मंदिर में मोदी का अलग रूप

सवाल: क्या आपने प्रधानमंत्री के व्यक्तित्व का कोई ऐसा पक्ष देखा है, जो कैमरों के सामने दिखाई नहीं देता?

जवाब: जब मोदी काशी विश्वनाथ मंदिर में होते हैं, तो उनका व्यवहार बहुत अलग दिखाई देता है। मेरी ईमानदार धारणा है कि वहां वह पूरी तरह भक्ति में लीन हो जाते हैं।
उन्होंने स्वयं भी कहा है कि मंदिर जाने से उन्हें जो शक्ति मिलती है, वह उन्हें देश में कहीं और नहीं मिलती।
काशी विश्वनाथ मंदिर का इतिहास भी बहुत महत्वपूर्ण है। इस मंदिर ने इतिहास में कई हमलों का सामना किया। रंजीत सिंह और अहिल्याबाई होलकर जैसे लोगों ने अलग-अलग समय पर इसके पुनर्निर्माण और संरक्षण में योगदान दिया।
आज मंदिर परिसर का विस्तार उस स्तर तक हुआ है, जिसकी कल्पना पहले करना कठिन था। मंदिर में दर्शन के बाद मणिकर्णिका घाट तक पहुंचा जा सकता है। एक तरफ पूजा और आस्था का वातावरण है, तो दूसरी तरफ जीवन के अंतिम संस्कार का दृश्य। यह अनुभव इंसान को जीवन की वास्तविकता का एहसास भी कराता है।

निजी मोदी और सार्वजनिक मोदी में कितना अंतर?

सवाल: तीन किताबों और वर्षों के शोध के आधार पर आप नरेंद्र मोदी के निजी और सार्वजनिक व्यक्तित्व के बीच क्या अंतर महसूस करते हैं?

जवाब: मेरे अनुभव में मोदी भावनात्मक व्यक्ति हैं। उनमें लोगों को पढ़ने की एक असाधारण क्षमता है। ऐसा लगता है कि वह सामने वाले को बहुत ध्यान से देखते हैं और कुछ ही क्षणों में समझने की कोशिश करते हैं कि उसके मन में क्या चल रहा है।
यह क्षमता अनुभव से विकसित हुई होगी। वह परिस्थितियों को पढ़ने में भी इसका इस्तेमाल करते हैं।
मेरी धारणा है कि आप उनसे व्यक्तिगत रूप से मिले हों या किसी माध्यम से संपर्क में रहे हों, वह आपको नोटिस करते हैं। लोगों और परिस्थितियों पर उनकी नजर रहती है।

1974 का जापानी उपहार: एक छोटी घटना, बड़ा संकेत

सवाल: आपकी किताबों में से कौन-सा प्रसंग प्रधानमंत्री के व्यक्तित्व को सबसे अच्छी तरह सामने लाता है?

जवाब: किसी एक प्रसंग को चुनना आसान नहीं है। लेकिन मैं आरएसएस के दिनों के उनके एक परिचित भागीरथ देसाई से जुड़ी घटना बताना चाहूंगा।
यह घटना 1974 की है। भागीरथ देसाई ने बताया कि मोदी ने उन्हें अपने लिए डाकघर से एक पार्सल लाने को कहा था। पार्सल खोलने पर उसमें जापानी शेविंग मशीन, हेयर ड्रायर, नेलकटर और जापानी पेन थे।
मोदी ने नेलकटर और पेन निकालकर सीधे भागीरथ देसाई को दे दिए।
इस घटना में एक दिलचस्प बात यह है कि 1974 में गुजरात में रहने वाले एक व्यक्ति का जापान में मित्र था, जो उसे उपहार भेज रहा था। यह प्रसंग उस समय मोदी के संपर्कों और उनके व्यापक दृष्टिकोण की ओर संकेत करता है।

युवाओं को मोदी के जीवन से क्या सीखना चाहिए?

सवाल: आज के युवा, खासकर जेनरेशन Z, मोदी के जीवन से क्या सीख सकते हैं?

जवाब: मेरे विचार से सबसे महत्वपूर्ण बात है प्रतिबद्धता, अनुशासन और काम करने का तरीका। किसी भी काम को पूरी लगन से करना, उसके हर पहलू पर ध्यान देना और व्यापक सोच रखना जरूरी है।
जीवन हमेशा उतना सरल नहीं होता, जितना बाहर से दिखाई देता है। वास्तविक संघर्ष से हासिल की गई उपलब्धियां अक्सर लंबे समय तक टिकती हैं।
आज के समय में लोग तुरंत परिणाम चाहते हैं, लेकिन लंबे सफर में धैर्य और निरंतर मेहनत का महत्व समझना जरूरी है।

सवाल: क्या प्रधानमंत्री के निर्णय लेने के तरीके में भी यही अनुशासन दिखाई देता है?

जवाब: मेरी समझ में मोदी किसी निर्णय पर एक दिन में नहीं पहुंचते। जब वह किसी बात पर निर्णय लेते हैं, तो उसके पीछे कई तरह के विचार होते हैं—फायदे, नुकसान और दूसरे पहलुओं पर विचार।
वह इस बात को भी स्वीकार करते हैं कि किसी विषय को कोई दूसरा व्यक्ति उनसे बेहतर समझा या समझा सकता है। ऐसी स्थिति में वह खुलकर उस व्यक्ति की विशेषज्ञता को मानते हैं। नई चीजें सीखने में भी उन्हें संकोच नहीं है, चाहे वह आज के समय में चर्चा में रहने वाली आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी तकनीक ही क्यों न हो।

पुणे के कॉलेज का प्रसंग: तैयारी और बारीकी पर जोर

सवाल: उनके काम करने के तरीके को समझाने वाला कोई और उदाहरण?

जवाब: पुणे के फर्ग्यूसन कॉलेज में एक संबोधन से पहले उनकी टीम ने देशभर से सुझाव मांगे थे कि उन्हें भाषण में किन विषयों पर बात करनी चाहिए।
हजारों पत्र आए। उनमें से पहले दस पत्र चुने गए और फिर पांच को शॉर्टलिस्ट किया गया।
यह प्रसंग बताता है कि वह किसी कार्यक्रम की तैयारी में कितनी बारीकी से काम करते हैं। उनके लिए तैयारी केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि काम का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

1976 का मच्छू बांध हादसा और राहत कार्य

सवाल: उनके शुरुआती सार्वजनिक जीवन से जुड़ी कोई घटना, जो उनके काम करने के तरीके को दर्शाती हो?

जवाब:1976 के मच्छू बांध हादसे का प्रसंग महत्वपूर्ण है। उस समय मोदी आरएसएस के साथ काम कर रहे थे और राहत कार्य के लिए भेजे गए थे।
वह अन्य लोगों के साथ घर-घर जाकर चंदा एकत्र कर रहे थे। सभी को जिम्मेदारियां दी गई थीं और उनके पास प्रभावित घरों तथा गांवों के पुनर्निर्माण की एक विस्तृत योजना थी।
एक व्यापारी ने उनसे पूछा कि योजना क्या है। मोदी ने पूरी योजना समझाई। इसके बाद व्यापारी ने उनकी उम्र पूछी। जब उसे पता चला कि वह इतने कम उम्र में यह काम कर रहे हैं, तो वह प्रभावित हुआ और उसने दो किस्तों में कुल सात लाख रुपये देने पर सहमति जताई।

1976 में सात लाख रुपये एक बड़ी राशि थी।

शिक्षा और शुरुआती जीवन

सवाल: प्रधानमंत्री के स्कूली और कॉलेज जीवन के बारे में आपकी किताबों में क्या जानकारी मिलती है?

जवाब: मोदी की शिक्षा कई अलग-अलग चरणों से गुजरी। उनके परिवार को भी अलग-अलग समय पर चुनौतियों का सामना करना पड़ा। इसके बावजूद उन्होंने आगे पढ़ाई जारी रखी और अहमदाबाद में भी शिक्षा हासिल की।
आनंदीबेन पटेल, जो आगे चलकर बीजेपी की वरिष्ठ नेता बनीं, उनके कॉलेज की वरिष्ठ थीं। दोनों वी.एन. कॉलेज, विसनगर में पढ़ते थे। मोदी उनसे जूनियर थे। इसके बाद मोदी ने अहमदाबाद में अपनी शिक्षा आगे जारी रखी।

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संपादकीय टिप्पणी
अरविंद चतुर्वेदी के अनुभवों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के व्यक्तित्व के कई पहलू सामने आते हैं—वाराणसी के प्रति उनका जुड़ाव, निजी जीवन में लोगों पर ध्यान देने की आदत, शुरुआती दिनों के संपर्क, काम में तैयारी और युवाओं के लिए अनुशासन तथा निरंतर प्रयास का महत्व।
यह सामग्री न्यूज कोरिडोर के साथ अरविंद चतुर्वेदी की बातचीत के आधार पर तैयार किया गया पुनर्लेखन है।