भारत 18वें BRICS शिखर सम्मेलन की मेजबानी कर रहा है। 12 और 13 सितंबर को भारत मंडपम में होने वाले इस सम्मेलन पर दुनिया की नजर रहेगी। भारत इस समय BRICS का अध्यक्ष है और 2026 की अध्यक्षता के लिए उसकी आधिकारिक थीम है- “मजबूती, इनोवेशन, सहयोग और सस्टेनेबिलिटी के लिए निर्माण”।
BRICS अब 11 सदस्य और 10 पार्टनर देशों वाला समूह है। यह दुनिया की लगभग आधी आबादी और ग्लोबल जीडीपी के करीब 40 प्रतिशत हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है। समिट के दौरान नेताओं की बॉडी लैंग्वेज, उनके भाषण और सम्मेलन के अंत में जारी होने वाले संयुक्त घोषणा-पत्र की भाषा पर खास नजर रहेगी।
घोषणा-पत्र में क्या शामिल किया जाता है और किन मुद्दों को छोड़ा जाता है, इससे यह संकेत मिलेगा कि समूह ग्लोबल इकोनॉमी से जुड़े अहम मुद्दों पर किस तरह का रुख अपनाता है।
BRICS में किन आर्थिक मुद्दों पर रहेगी नजर?
शिखर सम्मेलन में वैकल्पिक सप्लाई चेन, विवादों के समाधान, ग्रीन फाइनेंस, टेक्नोलॉजी, डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर और ग्लोबल फाइनेंशियल संस्थाओं में अधिक प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दे अहम रहेंगे।
इसके अलावा क्रॉस-बॉर्डर पेमेंट, टैरिफ को लेकर अनिश्चितता और व्यापार में लोकल करेंसी के इस्तेमाल पर भी चर्चा की उम्मीद है। सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी को आपस में जोड़ने का मुद्दा भी चर्चा में रह सकता है।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर भी बातचीत पहले से एडवांस लेवल पर चल रही है। यह चर्चा रियो डी जनेरियो में 2025 में हुई लीडर्स समिट की बातचीत से आगे बढ़ रही है। वहां मुख्य विषय यूएन के नेतृत्व में सबके लिए AI गवर्नेंस का साझा फ्रेमवर्क बनाने पर था।
फूड और एनर्जी सिक्योरिटी को लेकर भी घोषणाएं हो सकती हैं।
BRICS का विस्तार और बढ़ता प्रभाव
BRICS की शुरुआत 2001 में ‘BRIC’ शब्द के साथ हुई थी। यह नाम गोल्डमैन सैक्स ने दिया था। उस समय अनुमान लगाया गया था कि आने वाले दशकों में भारत, चीन, रूस और ब्राजील दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं बन जाएंगे।
समूह ने 2009 में अपना पहला शिखर सम्मेलन आयोजित किया। दक्षिण अफ्रीका के शामिल होने के बाद यह BRIC से BRICS बन गया।
आज इसमें ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका, इथियोपिया, मिस्र, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब और इंडोनेशिया शामिल हैं। 2006 में चार सदस्यों से शुरू होकर अब 11 सदस्यों तक पहुंचने के साथ समूह का कूटनीतिक प्रभाव भी बढ़ा है।
BRICS शुरू से ही IMF और World Bank जैसे अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों में विकासशील देशों की बेहतर भागीदारी के लिए आवाज उठाता रहा है। समूह ने विकासशील देशों को अपने विचार रखने और जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दों पर एकजुट रुख अपनाने के लिए जगह बनाने की कोशिश की है। इसके अलावा BRICS New Development Bank जैसे वित्तीय तंत्र भी बनाए गए हैं।
हालांकि, विस्तार के बावजूद सभी मुद्दों पर सदस्य देशों की राय एक जैसी नहीं है। यही सवाल अहम है कि अलग-अलग राजनीतिक और रणनीतिक लक्ष्यों वाले देश अपनी आर्थिक ताकत को राजनीतिक और आर्थिक सहमति और प्रभाव में कितना बदल पाते हैं।
डी-डॉलरलाइजेशन पर भारत और रूस-ईरान की अलग राय
BRICS के भीतर डी-डॉलरलाइजेशन यानी अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करने और अपनी करेंसी बनाने को लेकर मतभेद हैं।
रूस और ईरान BRICS के भीतर डी-डॉलरलाइजेशन को पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों का मुकाबला करने के रणनीतिक और आर्थिक तरीके के तौर पर देखते हैं। वहीं भारत BRICS की करेंसी बनाने के खिलाफ है।
वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने अगस्त में साफ कहा था कि भारत की किसी संयुक्त करेंसी की कोई योजना नहीं है। भारत इसके बजाय सीमा-पार भुगतान बढ़ाने के पक्ष में रहा है।
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने सीमा-पार व्यापार और पर्यटन से जुड़े भुगतान को आसान बनाने के लिए BRICS देशों की आधिकारिक डिजिटल करेंसी को आपस में जोड़ने पर जोर दिया है।
ईरान और यूएई के बीच मतभेद भी अहम
BRICS के सामने ईरान का मुद्दा भी एक चुनौती है। ईरान चाहता है कि BRICS अमेरिका द्वारा किए गए सैन्य हमलों की निंदा करे, जबकि इस मामले पर यूएई का रुख अमेरिका के पक्ष में है।
अगस्त में यूएई ने ईरान पर खाड़ी में अपने समुद्री शिपिंग रूट की तरफ मिसाइलें दागने का आरोप लगाते हुए उसके साथ सभी तरह के व्यापार और वित्तीय लेन-देन रोक दिए थे।
इस साल की शुरुआत में BRICS देशों के विदेश मंत्रियों और उप-विदेश मंत्रियों की बैठक ईरान विवाद को लेकर मतभेदों के कारण बिना किसी संयुक्त बयान के खत्म हो गई थी। भारत के सामने ऐसी भाषा या तरीका तलाशने की चुनौती होगी जिसे दोनों देश स्वीकार कर सकें।
चीन के साथ रिश्ते और BRICS की एकजुटता
भारत और चीन के संबंध हाल के समय में बेहतर हुए हैं, लेकिन दोनों देशों के बीच प्रतिद्वंद्विता और सीमा विवाद लंबे समय से BRICS के भीतर एकजुटता के रास्ते में बाधा बने हुए हैं।
दोनों देशों के रणनीतिक लक्ष्य अलग-अलग हैं और सीमा विवाद के कारण अविश्वास की भावना भी बढ़ती है। चीन BRICS को पश्चिमी प्रभाव का मुकाबला करने और युआन को बढ़ावा देने के माध्यम के तौर पर देखता है। वहीं भारत इसे विकासशील देशों का प्रतिनिधित्व करने और बहुपक्षवाद को बढ़ावा देने वाले समूह के रूप में देखता है।
अगर चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच बैठक होती है, तो भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं के दौर में चीन के साथ संबंधों को और स्थिर करने का मौका मिल सकता है।
भारत के लिए BRICS क्यों जरूरी है?
भारत के लिए BRICS रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखने का एक जरिया है। भारत चीन, रूस, ईरान और दूसरे देशों के साथ जुड़ते हुए अमेरिका और यूरोप के साथ भी अपने संबंध मजबूत करता रहेगा।
BRICS की मेजबानी भारत को वैश्विक मंच पर अपनी ताकत दिखाने और ऐसे देश के तौर पर अपनी साख बढ़ाने का मौका देती है, जो कई देशों के साथ संबंध बनाए रखता है।
पिछले साल ब्राजील में हुए शिखर सम्मेलन में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग शामिल नहीं हुए थे, जबकि रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन वर्चुअल तरीके से शामिल हुए थे। पुतिन का दौरा तय हो गया है, लेकिन चीन की तरफ से अभी पुष्टि होनी बाकी है।
क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने पुष्टि की है कि शुक्रवार को मोदी और पुतिन के बीच बैठक होगी।
भारत के लिए BRICS सीमा-पार आतंकवाद का मुद्दा उठाने का भी एक मंच है। पिछले साल के शिखर सम्मेलन में भारत की चिंताएं संयुक्त घोषणापत्र में दिखाई दी थीं, जिसमें सदस्यों ने पहलगाम आतंकी हमले की कड़ी निंदा की थी।
अमेरिका की अनिश्चित टैरिफ नीतियों और बढ़ते लेन-देन पर आधारित रवैये के बीच BRICS भारत को सदस्य देशों के साथ अपने संबंधों में विविधता लाने और उन्हें मजबूत करने का मौका भी देता है। साथ ही, यह बहुपक्षवाद की वकालत और बेहतर प्रतिनिधित्व के लिए मौजूदा वैश्विक व्यवस्था में सुधार की भारत की पुरानी बात रखने का मंच भी है।
BRICS Summit 2026 से क्या उम्मीदें?
समिट में ग्लोबल इकोनॉमी को प्रभावित करने वाले मुद्दों पर BRICS के रुख पर नजर रहेगी। क्रॉस-बॉर्डर पेमेंट और टैरिफ को लेकर अनिश्चितता के बीच व्यापार में लोकल करेंसी के इस्तेमाल पर चर्चा अहम हो सकती है। AI गवर्नेंस, सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी, फूड और एनर्जी सिक्योरिटी से जुड़े मुद्दों पर भी चर्चा और घोषणाओं की उम्मीद है।