यूपी में मुस्लिम वोटों को लेकर सियासी हलचल तेज, PDA और सॉफ्ट हिंदुत्व के बीच दलों की नई रणनीति

यूपी में मुस्लिम वोटों को लेकर सियासी हलचल तेज, PDA और सॉफ्ट हिंदुत्व के बीच दलों की नई रणनीति
हाइलाइट्स
• यूपी 2027 में मुस्लिम वोटों पर किसकी नजर?
• सपा, बीजेपी और ओवैसी की क्या है रणनीति?
• मुस्लिम वोटों का समीकरण कैसे बदलेगा?

उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की आहट के साथ मुस्लिम बहुल सीटों पर राजनीतिक दलों की रणनीति चर्चा में है। एक ओर हिंदुत्व और सॉफ्ट हिंदुत्व के जरिए मतदाताओं तक पहुंचने की कोशिशें हैं, तो दूसरी ओर मुस्लिम वोटों को अपने पक्ष में बनाए रखने की कवायद चल रही है। समाजवादी पार्टी इस मामले में सतर्क नजर आ रही है और अपने पारंपरिक मुस्लिम-यादव समीकरण को PDA यानी पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक गठजोड़ में विस्तार देने की कोशिश कर रही है।

मुस्लिम बहुल सीटों पर भाजपा की जीत और उपचुनावों में उसके प्रदर्शन ने विपक्षी दलों के सामने नई चुनौती रखी है। वहीं, असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM, चंद्रशेखर आजाद की आजाद समाज पार्टी-कांशीराम और बसपा भी मुस्लिम व दलित मतदाताओं के बीच अपना प्रभाव बढ़ाने में जुटी हैं।

भाजपा की जीत से सपा और इंडिया गठबंधन की रणनीति पर दबाव

मुस्लिम बहुल सीटों पर भाजपा की दावेदारी विपक्षी दलों के लिए चिंता का विषय बनी हुई है। विधानसभा उपचुनावों में कुंदरकी और रामपुर जैसी सीटों पर भाजपा की जीत ने इस चर्चा को और तेज किया है। वर्ष 2017 में सहारनपुर की देवबंद सीट जीतकर भी भाजपा ने सबको चौंकाया था।

इन सीटों पर गैर-मुस्लिम मतदाताओं के समीकरण को साधना भाजपा और इंडिया गठबंधन, दोनों के लिए अहम है। समाजवादी पार्टी ने चुनावी तैयारी के तहत हर सीट पर 27 हजार वोट और हर बूथ पर पांच नए वोट बढ़ाने का लक्ष्य रखा है।

गैर-मुस्लिम प्रत्याशियों के जरिए ध्रुवीकरण रोकने की कोशिश

समाजवादी पार्टी और कांग्रेस को लगता है कि साथ मिलकर चुनाव लड़ने से दलित और मुस्लिम मतदाताओं का समर्थन एकजुट हो सकता है। पार्टी को पिछले लोकसभा चुनाव में इस रणनीति के असर का अनुभव हुआ था।

सपा इस बार भी अपने प्रत्याशियों की सूची में मुस्लिम उम्मीदवारों की संख्या सीमित रखने की रणनीति पर काम कर रही है, ताकि विरोधियों को ध्रुवीकरण का अवसर न मिले। पिछले लोकसभा चुनाव में पार्टी ने चार मुस्लिम और पांच यादव उम्मीदवारों को टिकट दिया था और सभी जीत गए थे।

अब सपा के सामने अपने मुस्लिम-यादव आधार को व्यापक PDA गठजोड़ में बदलने की चुनौती है। इसके साथ ही उसे भाजपा की मजबूत चुनावी मशीनरी का मुकाबला भी करना है।

छोटे दल भी मुस्लिम और दलित वोटों पर लगा रहे जोर

AIMIM के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी और आजाद समाज पार्टी-कांशीराम के चंद्रशेखर आजाद मुस्लिम तथा दलित मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। इन दलों के उम्मीदवार अगर मजबूती से चुनाव लड़ते हैं, तो मुस्लिम वोटों के बंटवारे का असर किस राजनीतिक दल पर पड़ेगा, इस पर नजर रहेगी।

बहुजन समाज पार्टी भी अपने संगठन को दोबारा मजबूत करने में जुटी है। हालांकि, दिए गए संदर्भ के मुताबिक, मुस्लिम मतदाताओं के बीच पार्टी की पहुंच पहले जैसी नहीं दिख रही है।

इन छोटे दलों की ओर से सपा पर मुस्लिम हितों की अनदेखी के आरोप लगाए जा रहे हैं। वहीं, इंडिया गठबंधन में इन दलों को शामिल कराने की कोशिशें भी कुछ लोगों की ओर से की जा रही हैं।

उपचुनावों में भाजपा का प्रदर्शन, विपक्ष के लिए चुनौती

वर्ष 2022 के बाद अब तक 18 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव हुए, जिनमें भाजपा ने सबसे ज्यादा 11 सीटें जीतीं। इनमें कुंदरकी, रामपुर, गाजियाबाद, खैर, करहल, ददरौल, गोला गोकर्णनाथ, लखनऊ पूर्व, फूलपुर, मिल्कीपुर, कटेहरी और मंझवा सीटें शामिल थीं।

इन सीटों पर मुस्लिम मतदाताओं की भी अच्छी तादाद बताई गई है। अपना दल सोनेलाल ने रामपुर की स्वार और मिर्जापुर की छानवे सीट जीतीं। दूसरी ओर, समाजवादी पार्टी केवल कानपुर शहर की सीसामऊ और बलरामपुर की गैसड़ी सीट पर जीत दर्ज कर सकी।

राष्ट्रीय लोक दल ने सपा के साथ रहते हुए मुजफ्फरनगर की खतौली और मीरापुर सीटें जीती थीं।

2027 के चुनाव से पहले समीकरण साधने की चुनौती

उत्तर प्रदेश में मुस्लिम बहुल सीटों पर भाजपा की जीत, सपा की PDA रणनीति और छोटे दलों की सक्रियता ने राजनीतिक मुकाबले को नया आयाम दिया है। सपा के सामने अपने पारंपरिक वोट आधार को व्यापक गठजोड़ में बदलने की चुनौती है, जबकि AIMIM, आजाद समाज पार्टी-कांशीराम और बसपा मुस्लिम व दलित मतदाताओं के बीच अपनी जगह मजबूत करने की कोशिश कर रही हैं।

2027 के विधानसभा चुनाव से पहले इन दलों की रणनीतियां और उम्मीदवारों का चयन मुस्लिम बहुल सीटों पर राजनीतिक समीकरणों के लिहाज से अहम रहने वाला है।