नाना पाटेकर फिल्म साइन करने से पहले देखते थे ये 4 बातें, पैसा था सबसे आखिर में

नाना पाटेकर फिल्म साइन करने से पहले देखते थे ये 4 बातें, पैसा था सबसे आखिर में

नाना पाटेकर ने अपने पांच दशकों के फिल्मी करियर में फिल्मों की लंबी सूची बनाने के बजाय ऐसे किरदारों को प्राथमिकता दी, जिन्हें उनकी कला के दम पर याद रखा जाए। टीवी9 के एक एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि किसी फिल्म को स्वीकार करने से पहले वह किन चार बातों को सबसे ज्यादा महत्व देते थे। इन कसौटियों में कहानी, निर्देशक, सह-कलाकार और पैसा शामिल था, लेकिन फीस उनके लिए सबसे आखिरी प्राथमिकता थी।

कहानी सुनते समय खुद को आम दर्शक मानते थे नाना

नाना पाटेकर के फिल्म चुनने के तरीके में सबसे पहली जगह कहानी की थी। उनका कहना था कि जब कोई लेखक या निर्देशक उन्हें कहानी सुनाने आता था, तब वह खुद को स्टारडम के नजरिए से अलग रखते थे।

नाना के मुताबिक, वह कहानी को एक अभिनेता की तरह नहीं बल्कि थिएटर में बैठे आम दर्शक की तरह सुनते थे। अगर कहानी उन्हें आम इंसान के तौर पर प्रभावित करती, हंसाती या रुलाती थी, तभी वह आगे बढ़ते थे। उनके अनुसार, अगर कहानी में दम नहीं है तो स्टारडम भी उसे नहीं बचा सकता।

निर्देशक पर भी निर्भर था फिल्म का फैसला

कहानी पसंद आने के बाद नाना पाटेकर की दूसरी कसौटी निर्देशक होता था। वह यह देखना जरूरी मानते थे कि कहानी को पर्दे पर उतारने वाले निर्देशक के पास उसे सही तरीके से पेश करने का विजन है या नहीं।

उनके लिए यह भी महत्वपूर्ण था कि निर्देशक कहानी के साथ न्याय कर पाए। नाना का मानना था कि कमजोर निर्देशक अच्छी स्क्रिप्ट को भी नुकसान पहुंचा सकता है। इसलिए किसी प्रोजेक्ट पर भरोसा करने से पहले निर्देशक की नीयत और उसकी कला को परखना उनके लिए जरूरी था।

को-स्टार्स और पूरी टीम को भी देते थे महत्व

नाना पाटेकर सिर्फ अपने किरदार को देखकर फिल्म का चुनाव नहीं करते थे। उनकी तीसरी कसौटी फिल्म की टीम और सह-कलाकारों की क्षमता थी।

वह ‘वन-मैन शो’ में भरोसा नहीं करते थे। नाना के अनुसार, किसी मैच को जीतने के लिए सिर्फ एक खिलाड़ी की सेंचुरी काफी नहीं होती। आखिरी के दो ओवरों में 10-15 रन जोड़ने वाला खिलाड़ी भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है। इसी सोच के तहत वह अपने साथ काम करने वाले कलाकारों की प्रतिभा और उनके समर्पण को महत्व देते थे।

पैसा उनकी प्राथमिकताओं में सबसे नीचे था

नाना पाटेकर के लिए चौथी और आखिरी कसौटी पैसे थे। उन्होंने साफ कहा था, “चौथी बात आती है कि मुझे पैसे मिलेंगे या नहीं! यह मेरे लिए हमेशा सबसे आखिरी बात रही है. अगर ऊपर की तीनों शर्तें पूरी हैं और काम में ईमानदारी है, तो पैसे कम भी हों या देर से मिलें, मुझे फर्क नहीं पड़ता.”

यानी उनके लिए किसी फिल्म का चुनाव सबसे पहले कहानी की मजबूती, फिर निर्देशक की क्षमता और उसके बाद टीम पर निर्भर करता था। पैसा इन तीनों के बाद आता था।