आडवाणी जी: एक शताब्दी की ओर बढ़ती प्रेरणादायी यात्रा

आडवाणी जी: एक शताब्दी की ओर बढ़ती प्रेरणादायी यात्रा
  • लेखक- प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी

आज 8 नवंबर को लालकृष्ण आडवाणी अपने जीवन के सौवें वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं। यह सुखद संयोग है कि इसी दिन दीपावली का पावन पर्व भी है। प्रभु श्रीराम और दीपों के उत्सव के साथ आडवाणी के जीवन का यह महत्वपूर्ण पड़ाव और यादगार बन गया है। इस वर्ष जनसंघ की स्थापना के 75 वर्ष, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 वर्ष और डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जयंती भी मनाई जा रही है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आडवाणी के जन्मदिन पर उनके साथ अपने आत्मीय संबंधों और लंबे राजनीतिक सफर से जुड़े संस्मरण साझा किए हैं। उन्होंने कहा कि आडवाणी का स्नेह, सान्निध्य और मार्गदर्शन उन्हें हमेशा मिलता रहा है। सार्वजनिक जीवन में कई दशक पहले उनके संपर्क में आने के बाद धीरे-धीरे यह संबंध इतना आत्मीय हो गया कि वे उनके लिए अभिभावक की तरह बन गए। उन्होंने राजनीति की बारीकियां सिखाईं और कठिन परिस्थितियों में अपने अनुभव से मार्गदर्शन किया।

विभाजन की पीड़ा से शुरू हुआ नया सफर

आडवाणी का जन्म 8 नवंबर, 1927 को देव दीपावली के दिन हुआ था। वर्ष 1947 में देश के विभाजन के दौरान उन्हें सिंध में अपना घर, परिवेश और परिचित दुनिया छोड़नी पड़ी। जीवन की नई शुरुआत शून्य से करनी पड़ी, लेकिन इस कठिन अनुभव के बावजूद उनके मन में कभी कड़वाहट या पछतावा नहीं रहा। कठिन परिस्थितियों में नए सिरे से कुछ खड़ा करने का उनका संकल्प जीवनभर बना रहा। जनसंघ को मजबूत बनाने और बाद में भारतीय जनता पार्टी के निर्माण में भी यही प्रतिबद्धता दिखाई दी।

भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में उनके कार्यकाल में देश की राजनीति में महत्वपूर्ण बदलाव आए। वर्ष 1989 में कांग्रेस की सीटें 400 से घटकर 200 से नीचे आ गईं। वर्ष 1996 में भाजपा पहली बार देश की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। आडवाणी ने कार्यकर्ताओं की कई पीढ़ियों को तैयार किया और राष्ट्र प्रथम के सिद्धांत पर पार्टी की मजबूत नींव रखी।

वैचारिक स्पष्टता और संगठन निर्माण में योगदान

प्रधानमंत्री ने आडवाणी के व्यक्तित्व की दो प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख किया। पहली उनकी वैचारिक स्पष्टता और बौद्धिक प्रखरता तथा दूसरी भारतीय राजनीति में लंबे समय तक प्रभावी रही छद्म धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ उनका स्पष्ट और निर्भीक रुख। जनसंघ और भाजपा के लिए उनके लिखे प्रस्ताव आज भी विचार और अध्ययन के योग्य हैं।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक के रूप में उन्होंने राजस्थान के विभिन्न क्षेत्रों में काम किया। इसके बाद दिल्ली आए और अटल बिहारी वाजपेयी के साथ मिलकर संगठन को आगे बढ़ाया। दोनों नेताओं ने पांच-छह दशकों तक कंधे से कंधा मिलाकर काम किया। प्रधानमंत्री ने इसे भारतीय राजनीति में आपसी विश्वास, सहयोग और समर्पण की अनूठी मिसाल बताया।

संसद से सरकार तक निभाई अहम जिम्मेदारी

आडवाणी की संसदीय यात्रा 1970 के दशक में शुरू हुई। वर्ष 1967 में वे दिल्ली महानगर परिषद के अध्यक्ष बने थे। संसद के दोनों सदनों में उनकी सक्रियता और विपक्ष के नेता के रूप में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही। वर्ष 1977 में जनता सरकार बनने पर उन्हें सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की जिम्मेदारी मिली। बाद में उप प्रधानमंत्री और लंबे समय तक देश के गृह मंत्री के रूप में उन्होंने सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने में योगदान दिया। आतंकवाद के खिलाफ उनका रुख स्पष्ट और दृढ़ रहा।

आपातकाल को उनके जीवन का महत्वपूर्ण मोड़ बताते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि उस दौर में वे लोकतंत्र और संविधान की रक्षा के संघर्ष में अग्रिम पंक्ति में खड़े रहे। उनकी पुस्तक 'ए प्रिजनर्स स्क्रैप-बुक' में आपातकाल के अनुभवों का उल्लेख मिलता है।

सोमनाथ से अयोध्या तक रथयात्रा का ऐतिहासिक अध्याय

आडवाणी की सोमनाथ से अयोध्या तक निकली रथयात्रा को प्रधानमंत्री ने उनके जीवन का ऐतिहासिक अध्याय बताया। उन्होंने कहा कि इस यात्रा की परिकल्पना, तैयारियों और उसे आगे बढ़ाने में उन्हें भी योगदान देने का अवसर मिला। यात्रा के दौरान बिहार में आडवाणी की गिरफ्तारी को उन्होंने दुखद क्षण बताया। उस समय गुजरात में भाजपा ने चिमनभाई पटेल सरकार से समर्थन वापस ले लिया था। इसके पीछे राम मंदिर निर्माण के संकल्प पर समझौता नहीं करने का संदेश था। वर्षों बाद अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का सपना साकार हुआ।

सादगी, अध्ययन और संस्कृति से गहरा जुड़ाव

प्रधानमंत्री ने आडवाणी की सादगी, सरलता और सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी को भी उल्लेखनीय बताया। उन्हें पढ़ने का शौक रहा है। अखबारों को बारीकी से पढ़ने के साथ सिनेमा और रंगमंच में भी उनकी रुचि रही। वे लंबे समय तक फिल्मों की समीक्षा करते रहे। उनकी पुस्तक 'माई कंट्री माई लाइफ' में इतिहास के प्रति उनकी समझ और उसे सहेजने की भावना दिखाई देती है।

आडवाणी का सिंधी संस्कृति से भी गहरा जुड़ाव रहा है। लेह के पास सिंधु दर्शन पूजा को लोकप्रिय बनाने में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। प्रधानमंत्री ने कमला आडवाणी के योगदान का उल्लेख करते हुए कहा कि इतने लंबे सार्वजनिक जीवन में वे हमेशा उनकी शक्ति और संबल बनी रहीं।

भारत रत्न से सम्मानित हुआ असाधारण राजनीतिक जीवन

कराची में पले-बढ़े आडवाणी ने शायद ही कल्पना की होगी कि उनका जीवन इतनी लंबी और असाधारण यात्रा तय करेगा। देश के प्रति उनके योगदान के लिए वर्ष 2024 में उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया। प्रधानमंत्री ने उनके सौवें वर्ष में प्रवेश पर उत्तम स्वास्थ्य की कामना करते हुए कहा कि वे इसी तरह सभी को प्रेरणा और मार्गदर्शन देते रहें।