दिल्ली का जंतर-मंतर लंबे समय से लोगों के विरोध और अपनी मांगें सरकार तक पहुंचाने का प्रमुख केंद्र रहा है। संसद भवन के नजदीक स्थित इस जगह पर 1993 में पहला विरोध प्रदर्शन हुआ था। तब से यहां हजारों छोटे-बड़े आंदोलन हो चुके हैं। हालांकि, 12 अक्टूबर 2026 को दिल्ली पुलिस ने आदेश जारी कर जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल के रूप में डिनोटिफाई कर दिया। इस फैसले के बाद यहां धरना-प्रदर्शन नहीं किया जा सकेगा।
जंतर-मंतर की पहचान आज एक खगोलीय वेधशाला के साथ-साथ लोकतांत्रिक विरोध की जगह के रूप में भी है। लेकिन इसका निर्माण प्रदर्शन आयोजित करने के लिए नहीं हुआ था। समय के साथ यह स्थान लोगों की आवाज सरकार तक पहुंचाने का माध्यम बना। इससे पहले दिल्ली में प्रदर्शन कहां होते थे और जंतर-मंतर पर रोक लगाने के फैसले कब-कब हुए, इसकी कहानी कई महत्वपूर्ण घटनाओं से जुड़ी है।
जंतर-मंतर पर पहला विरोध प्रदर्शन कब हुआ?
जंतर-मंतर पर पहला विरोध प्रदर्शन 1993 में हुआ था। यह प्रदर्शन DUSU के अध्यक्ष आशीष सूद ने केंद्र सरकार के एक आदेश के बाद किया था। इसके बाद यह जगह हजारों छोटे और बड़े प्रदर्शनों का गवाह बनी।
संसद भवन के नजदीक होने के कारण जंतर-मंतर प्रदर्शनकारियों के लिए अहम स्थान बन गया। जो लोग अपने प्रतिनिधियों से सीधे मिलकर अपनी बात नहीं रख पाते, उनके लिए यहां प्रदर्शन करना सरकार तक अपनी मांग पहुंचाने का एक माध्यम बना।
प्रदर्शनकारियों की संख्या पर भी थी सीमा
31 जनवरी 2003 के दिल्ली पुलिस के स्टैंडिंग ऑर्डर नंबर 309 के मुताबिक, जंतर-मंतर पर 5000 से ज्यादा लोगों के एकत्र होने की अनुमति नहीं थी। प्रदर्शनकारी अपने वाहन भी यहां नहीं ला सकते थे। यदि प्रदर्शन में लोगों की संख्या निर्धारित सीमा से अधिक होती, तो रामलीला मैदान जाने का प्रावधान था।
जंतर-मंतर से पहले कहां होते थे विरोध प्रदर्शन?
जंतर-मंतर से पहले दिल्ली में विरोध प्रदर्शनों के लिए राजपथ, जिसे अब कर्तव्य पथ कहा जाता है, के पास स्थित बोट क्लब लॉन तय था। संसद भवन, राष्ट्रपति भवन और नॉर्थ व साउथ ब्लॉक के नजदीक होने के कारण यह स्थान सत्ता के सामने अपनी मांगें रखने के लिए उपयुक्त माना जाता था।
साल 1988 में किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत की अगुवाई में हजारों किसान बोट क्लब पर एक सप्ताह तक डटे रहे। इस दौरान किसानों ने वहीं खाना-पीना बनाया और अपने पशुओं को भी बांधा। इस घटनाक्रम के बाद सरकार ने कानून लाकर बोट क्लब पर विरोध प्रदर्शन करने पर प्रतिबंध लगा दिया।
इसके बाद जंतर-मंतर को प्रदर्शनकारियों के लिए आधिकारिक स्थल बना दिया गया। बोट क्लब से भी पहले दिल्ली में विरोध प्रदर्शन अकबर रोड पर हुआ करते थे।
2017 में एनजीटी ने क्यों लगाई थी रोक?
जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शनों को लेकर साल 2017 में भी प्रतिबंध लगाया गया था। राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने प्रदर्शन के कारण इलाके की हरियाली खराब होने और गंदगी फैलने का हवाला देते हुए यहां विरोध प्रदर्शन पर रोक लगा दी थी।
एनजीटी ने प्रदर्शनकारियों को रामलीला मैदान में जाने की सलाह भी दी थी। इसके बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने एनजीटी के आदेश पर रोक लगाते हुए दिल्ली पुलिस को नई गाइडलाइन जारी करने के लिए कहा था।
12 अक्टूबर 2026 को फिर क्यों चर्चा में आया जंतर-मंतर?
जंतर-मंतर एक बार फिर प्रदर्शन स्थल को लेकर चर्चा में है। 12 अक्टूबर 2026 को दिल्ली पुलिस ने आदेश जारी कर इसे प्रदर्शन स्थल के रूप में डिनोटिफाई कर दिया। इसका अर्थ है कि अब यहां धरना-प्रदर्शन नहीं किया जा सकेगा।
इससे पहले भी यहां प्रदर्शनों पर रोक लग चुकी है। साल 2017 में एनजीटी के प्रतिबंध के बाद 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने उस आदेश पर रोक लगाई थी और दिल्ली पुलिस से नई गाइडलाइन बनाने को कहा था।
जंतर-मंतर का निर्माण कब और क्यों हुआ था?
दिल्ली के जंतर-मंतर का निर्माण साल 1724 में महाराज जयसिंह द्वितीय ने कराया था। यह एक खगोलीय वेधशाला है। इसका उद्देश्य ग्रहों की स्थिति से जुड़ी बहस को खत्म करने से संबंधित था।
मोहम्मद शाह के शासनकाल में हिंदू और मुस्लिम खगोलशास्त्रियों के बीच ग्रहों की स्थिति को लेकर बहस छिड़ गई थी। इसे समाप्त करने के लिए सवाई जय सिंह ने जंतर-मंतर का निर्माण करवाया।
दिल्ली के अलावा जयपुर, उज्जैन, मथुरा और वाराणसी में भी उन्होंने जंतर-मंतर बनवाए थे। बताया जाता है कि दिल्ली का जंतर-मंतर समरकंद की वेधशाला से प्रेरित है।
इस तरह 1724 में खगोलीय वेधशाला के रूप में बना जंतर-मंतर समय के साथ विरोध प्रदर्शनों के प्रमुख केंद्र के रूप में पहचाना जाने लगा। यहां 1993 में पहला प्रदर्शन हुआ और बाद के वर्षों में इस स्थल पर प्रदर्शन को लेकर प्रतिबंध तथा अदालतों के आदेश भी सामने आए।